भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४६८ मृच्छकटिकम्

शकारः—( स्वगतम् ) अधम्मभीलुए बुड्ढखोडे, पललोअभीलू एशे गब्भदाशे । हग्गे लट्टिश्राले कश्श भाआमि बल-पुलिश-मणुश्शे ? (प्रकाशम्) अले गब्भदाशे चेटे ! गच्छ तुमं, ओवलके पविशिअ वीशन्ते एअन्ते चिट्ठ । ( अधर्मभीरुको वृद्धशृगालः, परलोकभीरुरेष गर्भदासः । अहं राष्ट्रियश्यालः कस्माद्बिभेमि वर-पुरुष-मनुष्यः ? ) ( अरे गर्भदास चेट ! गच्छ त्वम्, अपवारके प्रविश्य विश्रान्त एकान्ते तिष्ठ । )

**चेटः—**जं भट्टके आणवेदि । ( वसन्तसेनामुपसृत्य ) अज्जए ! एत्तिके मे विहवे । ( यद्भर्तृक आज्ञापयति । ) ( आर्ये ! एतावान् मे विभवः।) (इति निष्क्रान्तः।)

शकारः—( परिकरं बध्नन् ) चिट्ठ वसन्तशेणिए ! चिट्ठ, मालइश्शं । ( तिष्ठ वसन्तसेने ! तिष्ठ, मारयिष्यामि । )

**विटः—**आः ! ममाग्रतो व्यापादयिष्यसि ? ( इति गले गृह्णाति । )

शकारः—( भूमौ पतति ) भावे भट्टकं मालेदि । ( इति मोहं नाटयति । चेतनां लब्ध्वा ) ( भावो भर्तृकं मारयति । )


**विमर्श—**विट यहाँ भाग्य की उलटी क्रिया का वर्णन करता है। जो अच्छा कार्य करने वाला है वह नौकर बना है और जो गलत काम करने वाला है वह मालिक बना है।

यहाँ प्रथमपादगत वाक्यार्थ के प्रति अन्य तीन वाक्यों के अर्थ निष्पादक होते हुये हेतु हैं अतः यहाँ काव्यलिङ्ग अलंकार है ॥ २७ ॥

अर्थ—शकार—( अपने में ) यह बूढ़ा सियार [ विट ] अधर्म से डरने वाला है और यह जन्म से सेवक [ चेट ] परलोक से डरने वाला है। मैं श्रेष्ठ पुरुष राजा का शाला किससे डरने वाला हूँ । ( प्रकट में ) अरे जन्मकाल से ही नौकर चेट ! तुम जाओ, छिपने योग्य स्थान पर घुसकर शान्त होकर एकान्त में बैठो।

**चेट—**स्वामिन् ! जैसी आज्ञा ! ( वसन्तसेना के पास जाकर ) आर्ये ! इतनी ही मेरी शक्ति थी । ( यह कह कर निकल जाता है । )

शकार—( कमर कसता हुआ ) ठहर जा वसन्तसेना, ठहर जा, तुझे मार डालता हूँ ।

**विट—**आह ! मेरे आगे ही मारोगे ? ( यह कह कर गला पकड़ लेता है । )

शकार—( जमीन पर गिर पड़ता है । ) भाव ! स्वामी को मारते हो । ( मूर्च्छित होने का अभिनय करता है । होश में आकर । )