मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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मुद्राराक्षसम्
कर्तृणा, दोष्णा—बाहूना, मुहु —वारवारम्, सङ्कोचेनैव—सङ्क्षेपेणैव, अभि-नयन् —अभिनयकार्यं कुर्वन्, दाहभीते —अभिज्वलनशङ्कया, लक्ष्येषु—दृष्टि-विषयेषु, ज्वलनकणमुचम्—अग्निस्फुलिङ्गमोचनशीलाम्, उग्राम्—घोराम्, दृष्टि—नेत्रं भाललोचनमित्यर्थं, न—नहि, वध्नत —निक्षिपत, त्रिपुरविजयिन —महादेवस्य, आधारानुरोधात्—आधारस्य आश्रयस्य रङ्गभूमे ब्रह्माण्डोदरस्य इत्यर्थ अनुरोधात्—अनुकम्पया अर्थात् ब्रह्माण्डोदरम् अपर्याप्तं पूर्णताण्डवस्य इति हेतो, दुर्नृत्य—दुःखेन कष्टेन नृत्यं नर्तनं विकलताण्डवम् इति यावत्, व —युष्मान्, पातु—रक्षतु ॥२॥
**हिन्दी अनुवाद—**उत्पन्न होने वाली धरती की धँसान को पैर के मंद संचालन से बचाते हुए (अर्थात् कहीं धरा धमक से धँस न जाय इस कारण धीरे-धीरे पैरों को रखते हुए), समस्त लोकों का अतिक्रमण करने वाली भुजाओं को बार-बार संकुचित करके ही अभिनय करते हुए (अर्थात् कहीं भुजाओं के आघात से सम्पूर्ण लोक नष्ट न हो जायें इस भय से दृश्य पदार्थों पर अग्नि-स्फुलिंगों को छोड़ने वाली भयानक दृष्टि को न डालते हुए शिव का आधार के अनुरोध से (अर्थात् पूर्ण तांडव के लिए पर्याप्त न होने वाले निखिल ब्रह्मांड रूपी रंगभूमि के कारण) कृच्छ्रतापूर्ण नृत्य आप सब की रक्षा करे ॥२॥
टिप्पणी— आविर्भवन्तीम्— उत्पन्न होने वाली। आविम्√भू+लट् 'वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा' इत्यनेन भविष्यदर्थे, लट् शत्रादेश स्त्रियाम् = आविर्भवन्ती, ताम्। यह 'अवनतिम्' का विशेषण है। अवनतिम्— नीचे जाने को, धँसान को। अव√नम् +क्तिन् भावे स्त्रियाम् = अवनति ताम्। स्वैरपातै — सतर्कतापूर्वक या शनै शनै रखने से। ईरणम् ईर √ईर् + घञ् भावे। स्व ईर एषु इति स्वैरा बहुव्रीहि स०, 'स्वादीरेरिणा' इति वार्तिकेन वृद्धि। तादृशा पाता कर्मधारय स०, तै । करणे तृतीया। 'मन्द-स्वच्छन्दयो स्वैर' इत्यमर । रक्षत — बचाते हुए, दूर करते हुए। √रक्ष् + लट्-शतृ कर्तरि = रक्षन्, तस्य। यह 'त्रिपुरविजयिन' का विधेयात्मक विशेषण है। सर्वलोकातिगानाम्— सभी लोकों को पार कर जाने वाली। सर्वे लोका सर्वलोका कर्मधारय स०। तान् अतिगच्छन्ति इति सर्वलोक-अति√गम् +ड कर्तरि। तेषाम्। यह 'दोष्णाम्' का विशेषण है। दोष्णाम्— भुजाओं