भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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२२ मुद्राराक्षसम्

व्याख्याकः—एष, जृम्भाविदारितमुखस्य—जृम्भया शरीरस्वभावभूतयाऽऽस्यव्यादानात्मकक्रियया विदारितं प्रसारितं मुखम् आननं यस्य तस्य, हरेः—सिंहस्य, मुखात्, आस्वादितद्विरदशोणितशोणशोभाम्—आस्वादितं प्रपीतं यद् द्विरदशोणितं गजरक्तं तेन शोणा रक्तवर्णा शोभा कान्तिः यस्याः तादृशीम्, (अतएव) शशलाञ्छनस्य—चन्द्रमसः, सन्ध्यारुणा—सन्ध्यया सूर्यास्तमनवेलया अरुणा रक्तवर्णिता, कलाम् इव—मृगकान्तिमिव, स्फुरन्ती—विजृम्भमाणा, दंष्ट्रा—दशनं, परिभूय—अवज्ञाय, हर्तुम्—उत्पाटयितुम्, इच्छति—वाञ्छति ॥ ८ ॥

हिंदी अनुवाद—[ उसके बाद खुली हुई शिखा का स्पर्श करते हुए चाणक्य का प्रवेश ]

चाणक्य—मेरे रहते यह कौन चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करना चाहता है ? देखो—

कौन जँभाई के कारण फैलाये हुए मुख वाले सिंह के मुख से, पिये हुए हाथी के रक्त से लाल छविवाली और (अतएव) चन्द्रमा की सन्ध्याकालीन अरुण कान्ति-सी चमकने वाली दाढ़ को अवहेलनापूर्वक निकालना चाहता है ॥ ८ ॥

टिप्पणीमुक्तां शिखाम्—पहले चन्द्रगुप्त को राज्य दिलाने के लिए चाणक्य ने अपनी शिखा खोलकर प्रतिज्ञा की थी। यह शिखा चन्द्रगुप्त को राज्य दिला देने के बाद भी इसलिए खुली हुई थी कि अभी चन्द्रगुप्त की राज्यलक्ष्मी सुस्थिर नहीं हो सकी थी। परामृशन्—स्पर्श करते हुए। परा-आ✓मृश् + लट्—शतृ कर्तरि। यह दृश्य पाटलिपुत्र में चाणक्य के घर में प्रस्तुत होता है। कथं क एष मयि स्थिते—यहाँ से लेकर मुखसन्धि का निबन्धन किया गया है। मुखसन्धि में 'बीज' अर्थप्रकृति और 'आरम्भ' नामक अवस्था का संयोग होता है। यहाँ राक्षस को वश में करना कार्य है, चन्द्रगुप्त की लक्ष्मी को स्थिर करना उस कार्य का फल है, अनुकूल भाग्य हेतु है और चाणक्य की नीति का प्रयोग 'बीज' है। उस बीज की 'आरम्भावस्था' चाणक्य की उत्सुकता है और चाणक्य की उत्सुकता यह है कि मेरे जागरूक होते हुए भी मेरे पुरुषार्थ को कुछ न समझ-कर राक्षस मौर्य-लक्ष्मी का हरण करना चाहता है। अतएव अत्यन्त वीर, दण्ड-नीति में निष्णात और स्वामी नन्द के कार्य-भार को वहन करने में समर्थ राक्षस