मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४४ | मुद्राराक्षसम् |
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शक्तिषु चानश्' इत्यनेन चानश् । यह 'नरेन्द्र' और 'गजेन्द्र' दोनों का विधेयात्मक विशेषण है । स्वभावात — स्वभावेन इति स्वभाव + तसि तृतीयायाम् । 'प्रकृत्या-दिभ्य उपसंख्यानम्' इति वार्तिकेन तृतीया । इस पद्य में दीपक अलङ्कार और अनुष्टुप् छन्द है ॥ १६ ॥
[ तत प्रविशति यमपटेन चर । ]
चर —
पणमह जमस्स चलणे किं कज्ज देवएहि अणेहिं ।
एसो खु अण्णभत्ताण हरइ जीअ चडपडन्तम् ॥ १७ ॥
( प्रणमत यमस्य चरणौ किं कार्यं देवतैरन्यै ।
एष खल्वन्यभक्ताना हरति जीव परिस्फुरन्तम् ॥ )
तत — तदनन्तर, यमपटेन — यममूर्त्या चित्रितेन पटेन सह, चर — चाणक्यस्य गुप्तचर श्चित्रिन्, प्रविशति — समायाति — रङ्गभूमिम् इति शेष ।
अन्वय — यमस्य चरणौ प्रणमत, अन्यै देवतै किं कार्यम् । एष खलु अन्यभक्ताना परिस्फुरन्त जीव हरति ॥ १७ ॥
व्याख्या — यमस्य — धर्मराजस्य, चरणौ — पादौ, (यूय) प्रणमत — भजत, अन्यै — इतरे, देवतै — देवै, किं कार्यम् — किं प्रयोजनम् न किमपीत्यर्थ, एष खलु — यम, अन्यभक्तानाम् — तद्दान्तरोपासकाना, परिस्फुरन्त — स्यन्दमान, जीव — जीवन, हरति — नाशयति ॥ १७ ॥
हिन्दी अनुवाद — [ उसके बाद यमपट के साथ गुप्तचर आता है । ]
गुप्तचर — यमराज के चरणों को प्रणाम करो, दूसरे देवताओ से क्या प्रयोजन ? य ( यमराज ) दूसर (देवताओ ) के भक्तो के छटपटाते हुए प्राणो को हर लेते हैं ॥ १७ ॥
टिप्पणी — यमपटेन — यमराज के चित्रो से अकित वस्त्र से । पहले इस प्रकार के वस्त्र रखने वाले भिक्षुक लोगो को शुभाशुभ फल बताया करते थे । चाणक्य का यह गुप्तचर भी ऐसे ही भिक्षुक के वेश में जासूसी करता था । प्रणमत — इस पद्य का गूढ अर्थ यह है कि यमराज की तरह चाणक्य अपने भक्तो को समृद्ध बनाता है और राक्षस के भक्तो को मारता है । इसलिए चाणक्य