भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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४६मुद्राराक्षसम्

चाणक्य को लोग क्रूर समझते हैं, किन्तु वस्तुत वह क्रूर नही है। जो उनकी भक्ति करते हैं, उन्ह वह बहुत देना है। इसमे भी अप्रस्तुत प्रशसा अलकार तथा आर्या छन्द है । ॥ १८ ॥

शिष्य —[ विलोक्य ] भद्र ! न प्रवेष्टव्यम् ।

चर —[ विहस्य ] हहो वह्मण, कस्स एद गेहम् ? ( अहो ब्राह्मण, कस्येद गृहम् ? )

शिष्य —अस्माकमुपाध्यायस्य सुगृहीतनाम्न आर्यचाणक्यस्य ।

चर —[ विहस्य ] हहो वह्मण, अत्तकेरकस जेव्व मह धम्मभादुणो घर होदि । ता देहि मे पवेस जाव दे उवज्झाअस्स जमपड पसारिअ धम्म उवदिसामि । ( अहो ब्राह्मण, आत्मीयस्यैव मम धर्मभ्रातुर्गृह भवति । तस्माद्देहि मे प्रवेश यावत्तवोपाध्यायस्य यमपट प्रसार्य धर्ममुपदिशामि । )

शिष्य —[ सक्रोधम् ] धिक् मूर्ख, किं भवानस्मदुपाध्यायादपि धर्मवित्तर ?

चर —हहो वह्मण, मा कुप्प । णहि सव्वो सव्व जाणादि । ता किवि ते उवज्झाओ जाणादि, किवि अम्हारिसा जाणादि । (अहो ब्राह्मण, मा कुप्य । नहि सर्व सर्व जानाति । तत् किमपि ते उपाध्यायो जानाति, किमप्यस्मादृशा जानन्ति ।)

शिष्य —मूर्ख, सर्वज्ञतामुपाध्यायस्य चोरयितुमिच्छसि ?

चर —हहो वह्मण, जइ तव उवज्झाओ सव्व जाणादि ता जाणादु दाव कस्स चन्दो अणिब्भिप्पेदो त्ति । (अहो ब्राह्मण, यदि तवोपाध्याय सर्व जानाति तर्हिजानातु तावत्कस्य चन्द्रोऽनभिप्रेत इति ।

शिष्य—[ देखकर ] महाशय ! ( भीतर ) प्रवेश न करना ।

गुप्तचर—अहा ब्राह्मण ! यह किसका घर है ?

शिष्य—हमारे आचार्य प्रात स्मरणीय आर्य चाणक्य का ।

गुप्तचर—[ हंसकर ] ब्राह्मण देवता ! ( तब तो ) मेरे अपने ही धर्म-