मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० मुद्राराक्षसम्
गुप्तचर—यदि सुनने के लिये जानकार (व्यक्ति) मिलता।
चाणक्य—भद्र ! विश्वास के साथ भीतर आओ। सुनने और समझने वाले को पा जाओगे।
गुप्तचर—यह आया। [प्रवेश करके और समीप जाकर] आर्य की जय हो।
चाणक्य—[देखकर मन में] क्यो, यह तो प्रजा की मनोवृत्ति जानने के लिए नियुक्त किया गया निपुणक है। [प्रकट] भद्र ! (तुम्हारा) स्वागत है। बैठो।
गुप्तचर—आर्य की जैसी आज्ञा। [भूमि पर बैठ जाता है।]
टिप्पणी—चन्द्रगुप्तात्—अत्र अपादाने पञ्चमी। उपक्षिप्तम्—इङ्गित क्रिया। उप√क्षिप्+क्त कर्मणि। इसका अनुक्त कर्त्ता 'अनेन' है। असम्बद्धम्—असंगत, ऊटपटांग। सम्√बन्ध्+क्त कर्मणि = सम्बद्धम्। न सम्बद्धम् असम्बद्धम् नञ्तत्०। यह 'अभिधीयते' का उक्तकर्म है। उक्ते कर्मणि प्रथमा। अभिधीयते = कथ्यते। अभि√धा+लट्—ते कर्मणि। भवेत्, स्यात्—अत्र 'हेतुहेतुमतोर्लिङ्' इत्यनेन लिङ्। कथम्—यह आश्चर्यसूचक अव्यय है। यहाँ किसी पुस्तक में यह अधिक पाठ है—'क्व प्रभूतत्वात् कार्याणा कस्य परिज्ञाने नियुक्तो निपुणक इति न ज्ञायते। आ ज्ञातम्, अये।' इसका अर्थ है—'कार्य की अधिकता के कारण यह ध्यान में नहीं आ रहा है कि निपुणक को किस बात की जानकारी के लिए नियुक्त किया था। हाँ, समझ गया। अरे!'
चाणक्य—भद्र, वर्णयेदानीं स्वनियोगवृत्तान्तम्। अपि वृषलमनुरक्ताः प्रकृतयः ?
चर—अह इं ? अज्जेण क्खु तेसु तेसु विराअकारणेसु परिहरिज्जंतेसु सुगहीदणामहेए देवे चन्दउत्ते दिढं अनुरत्ताओ पकिदिओ। किंदु उण संति एत्थ णअरे अमच्चरक्खसेण सह पढमं समुप्पण्णसिणेहबहुमाणा तिण्णि पुरिसा, जे देवस्स चन्दसिरिणो सिरिं ण सहन्दि। (अथ किम् ? आर्येण खलु तेषु तेषु विरागकारणेषु परिह्रियमाणेषु सुगृहीतनामधेये देवे चन्द्रगुप्ते दृढमनुरक्ताः प्रकृतयः। किन्तु पुनः सन्त्यत्र नगरे अमात्यराक्षसेन सह प्रथमं समुत्पन्नस्नेहबहुमानास्त्रयः पुरुषाः, ये देवस्य चन्द्रश्रियः श्रियं न सहन्ते।)