भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

प्रथमोऽङ्कः ७६

चाणक्य—पहले ( यह ) मिथ्या ( है ) और अब 'था' ये बातें परस्पर विरोधी हैं ।

चन्दनदास—इतना ही मेरी बातों मे छल ( दोष ) है ।

चाणक्य—सेठजी ! चन्द्रगुप्त के राजा रहते छलो की गुंजाइश नही है । इसलिए राक्षस के परिवार को सौप दीजिए । ( ताकि ) आपके छल का पूर्ण अभाव हो जाय ।

टिप्पणीराजापथ्यकारिणः—भूपानिष्टविधायिनः । राजा का अनिष्ट करने वाले । पथोऽनपेतं पथ्यम् पथिन् + यत् । न पथ्यम् अपथ्यम् नञ्तत्० । राज्ञः अपथ्यम् षष्ठीतत्० । तत् करोति तच्छीलः राजापथ्य √ कृ + णिनि = राजापथ्यकारी, तस्य । अभिनीय—लाकर इस अर्थ मे इसका प्रयोग क्वाचित्क है । वैसे इसका अर्थ होता है नाट्य या अभिनय करके । अभि √ नी + क्त्वा—ल्यप् । अलीकम्—मिथ्या । आर्यस्य निवेदितम्—यहाँ शेषत्व की विवक्षा से षष्ठी हुई है; अन्यथा चतुर्थी होनी चाहिए था । अलमाशङ्कया—अत्र 'गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयोजिका' इत्यनेन तृतीया । आशङ्कया = भयेन, अलम् = व्यर्थम् असाध्यमिति यावत् । पूर्वराजपुरुषाः—पहले के राजाओं के कर्मचारी, पूर्वाश्च ते राजानः पूर्वराजाः कर्मधारय स०, समासान्त टच् । तेषा पुरुषाः षष्ठीतत्० । अनिच्छताम्—इससे यह सकेत किया गया है कि इसमे आपका दोष नही है, क्योकि आपके न चाहते हुए भी राक्षस ने अपने परिवार को आपके घर में रख छोड़ा । अतएव भयभीत होने की कोई आवश्यकता नही है । तत्प्रच्छादनम्—तस्य गृहजनस्य प्रच्छादनम् गोपनम् । इससे यह बताया गया है कि छिपाना आपका कार्य है, इसलिए दोष है । परस्परविरोधिनी—एक दूसरे के विरोधी ( वचन ) । क्योकि पहले तो चन्दनदास ने कहा कि हमारे घर में अमात्य राक्षस के परिवार के रहने की सूचना ही गलत है और अब कहता है कि पहले हमारे घर में अमात्य का परिवार था । इन दोनों बातो मे स्पष्टतः विरोध है । परेण परेण विरुध्यते इति परस्परेण विरुध्यते = परस्पर-वि √ रुध् + णिनि साधुकारिणि कर्तरि । परस्पर शब्द की सिद्धि इस प्रकार की जाती है—'कर्मव्यतिहारे सर्वनाम्नो द्वे वाच्ये समासवच्च बहुलम्' इत्यनेन परशब्दस्य द्वित्वम्, बहुलग्रहणात् समासवद्भावस्य अभावः, 'असमासवद्भावे पूर्वपदस्य सुपः