भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

द्वितीयोऽङ्कः १११

तं संप्रत्युपचीयमानमनु मे लब्धान्तरः सेवया
लोभो राक्षसवर्ज्जयाय यतते जेतुं न शक्नोति च ॥६॥

अन्वयः—चाणक्यनीत्या यथा जरया नन्दमिव कामं प्रमथ्य नगरे मौर्ये इव मयि धर्मः क्रमेण प्रतिष्ठां नीतः । सम्प्रति सेवया लब्धान्तरो मे लोभः राक्षसवत् उपचीयमानं तम् अनु जयाय यतते च जेतुं न शक्नोति ॥ ६ ॥

व्याख्याचाणक्यनीत्या—चाणक्यस्य कौटिल्यस्य नीत्या नयेन, यथा—इव, जरया—वार्द्धकेन, नन्दमिव—तदाख्यनृपमिव, कामं—भोगाभिलाषं, प्रमथ्य—सम्मर्द्य, नगरे—कुसुमपुरे, मौर्ये—वृषले, इव, धर्मः—सुकृतं, क्रमेण—आनुपूर्व्या, प्रतिष्ठां—स्थितिं, नीतः—आपादितः । सम्प्रति—अधुना, सेवया—(मलयकेतोः) शुश्रूषया, लब्धान्तरः—प्राप्तावसरः, मे—मम, लोभः—विषयाभिलाषः, राक्षसवत्—अमात्यराक्षस इव, उपचीयमानं—वर्द्धमानं, तम्—धर्मम्, अनु—धर्ममभिलक्ष्य, जयाय—विजयाय, यतते—उद्युङ्क्ते, —पुनः, जेतुं—विजेतुं, न शक्नोति—न समर्थो भवति ॥ ६ ॥

हिन्दी अनुवाद—[ तब कंचुकी प्रवेश करता है । ]

कंचुकी—चाणक्य की नीति की तरह बुढ़ापे ने नन्द की तरह काम (भोग-लिप्सा) को नष्ट करके नगर (कुसुमपुर) में चन्द्रगुप्त की तरह मुझमे धर्म को क्रमशः प्रतिष्ठित कर दिया । इस समय ( मलयकेतु की ) सेवा के कारण अवसर पाकर मेरा लोभ राक्षस की तरह बढ़ते हुए उस धर्म (पक्षान्तर में चन्द्रगुप्त ) को लक्ष्य करके जीतने के लिए यत्न करता है किन्तु जीतने में समर्थ नहीं हो पाता है ॥ ६ ॥

टिप्पणीकञ्चुकी—रनिवास का रक्षक, अन्तःपुराध्यक्ष । इसका लक्षण यह है—‘अन्तःपुरचरो वृद्धो विप्रो गुणगणान्वितः । सर्वकार्यार्थकुशलः कञ्चुकीत्यभिधीयते ।’ यह कंचुकी मलयकेतु का है । जरया—जरसा । ‘जराया जरसन्यतरस्याम्’ सूत्र से जरस् आदेश के विकल्प से होने के कारण पक्ष मे ‘जरया’ यह भी रूप होता है । प्रमथ्य—विनष्ट करके । प्र√मन्थ् + क्त्वा—ल्यप् । क्रमेण—अत्र ‘प्रकृत्यादिभ्य उपसङ्ख्यानम्’ इत्यनेन तृतीया । प्रतिष्ठाम्—स्थिति को । प्रति√स्था + अङ् भावे = प्रतिष्ठा, ताम् । तम् अनु—यहाँ ‘अनु’ को ‘लक्षणेत्थम्भूत’—सूत्र से कर्मप्रवचनीयसंज्ञा होने के कारण उसके