भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 488 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 303
२१६मुद्राराक्षसम्

राजा—अथ तावदेवम्। राक्षस पुनरिहैवान्तर्नगरे वर्तमान आर्येणोपेक्षित इत्यत्र किमुत्तरमार्यस्य ?

चाणक्य—राक्षसोऽपि खलु निजस्वामिनि स्थिरानुरागत्वात् सुचिरमेकत्रवासाच्च शीलज्ञाना नन्दानुरक्ताना प्रकृतीनामत्यन्त विश्वाश्य, प्रज्ञापुरुषकाराभ्यामुपेत सहायसम्पदा युक्त, कोपबलवानिहैवान्तर्नगरे वर्तमानो महान्तं खल्वन्त कोपमुत्पादयेत् । दूरीकृतस्तु बाह्यकोपमुत्पादयन्नपि न दु स्साध्यो भविष्यतीत्यतोऽपक्रामन्नुपेक्षित ।

राजा—तत् किमर्थमिहस्थ एवोपायैर्नोपक्रान्त ?

चाणक्य—अथ कथमपक्रान्तो भविष्यति ? ननु उपायैरेवासौ हृदयेशय शङ्कु रिवोद्धृत्य दूरीकृत । दूरीकरणस्य चोक्त प्रयोजनम् ।

राजा—आर्य ! कस्माद्विक्रम्य न गृहीत ?

चाणक्य—वृषल ! राक्षस खल्वसौ विक्रम्य निगृह्यमाण स्वयं वा विनश्येत्, युष्मद्वलानि वा विनाशयेत् । एव सत्युभयथापि दोष ।

पश्य

हिन्दी अनुवादराजा—आर्य ! इस विषय में बहुत पूछना है ।

चाणक्य—वृषल ! विश्राम के साथ पूछो । मुझे भी इस विषय में बहुत कुछ कहना है ।

राजा—अभी पूछता हूँ ।

चाणक्य—मैं भी अभी कहता हूँ ।

राजा—यह जो हमारे इस सम्पूर्ण अनर्थ का कारण मलयकेतु है, उसको भागते हुए, आपने क्यो उपेक्षित कर दिया ?

चाणक्य—वृषल ! मलयकेतु के भागने की उपेक्षा न करने मे दो बाते होती, (या तो उसे) अनुगृहीत किया जाता या दण्ड दिया जाता । अनुग्रह करने पर पहले का प्रतिज्ञा किया हुआ आधा राज्य दे दिया जाता, निग्रह करने पर पर्वतक को हमने मारा है—इस कृतघ्नता को स्वय सहारा देना होता । प्रतिज्ञा किये हुए आधे राज्य को दे देने पर भी पर्वतक का विनाश केवल कृतघ्नता-मात्र प्रयोजन को रखता । इसलिए भागते हुए मलयकेतु की उपेक्षा की गई ।