भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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२२० मुद्राराक्षसम्

अस्मद्बलाना जयघोषणादिषु बलात् व्याघात कृत , विपुले स्वनीतिविभवे अत्यर्थं सम्मोहम् आपादिता न मतय विश्वाम्येष्वपि स्वेषु वर्गेषु न विश्वमन्ति ॥ २६ ॥

व्याख्या—अस्माकं, गले—कण्ठे, पद—चरणं, कृत्वा—विधाय, लब्धाया—प्राप्तायां, पुरि—नगर्य्यां, यावदिच्छम्—यथारुचि, उषितम्—निवासं कृतं, अस्मद्बलानाम्—अस्माकं सैन्यानां, जयघोषणादिषु—विजय-प्रख्यापनप्रभृतिषु, बलात्—हठात्, व्याघात—विघ्न, कृत—उत्पादित, विपुले—महद्धि, स्वनीतिविभवे—स्वस्य आत्मन नीतय नया एव विभवा सम्पद तै, अत्यर्थम्—अत्यन्तं, सम्मोहम्—अविवेकम्, आपादिता—प्रापिता, —अस्माकं, मतय—बुद्धय , विश्वाम्येष्वपि—आप्तेषु च, स्वेषु—स्वकीयेषु, वर्गेषु—पदेषु, न विश्वमन्ति—न प्रतियन्ति ॥ २६ ॥

हिन्दी अनुवादराजा—हम आप की बात को बात से नहीं जीत सकते । (किन्तु) इस विषय में अमात्य राक्षस ही सब प्रकार से अधिक प्रशंसनीय है ।

चाणक्य—[ क्रोध के साथ ] आप नहीं, यह कहना शेष रह गया । हे वृषल ! उसने क्या किया ?

राजा—यदि नहीं जानते हैं तो सुनिए । उस महात्मा ने—

हमारे गले पर पैर रख कर (हमारी) जीती हुई नगरी में इच्छानुसार निवास किया, हमारी सेनाओं की विजय-घोषणा आदि में हठात् विघ्न उत्पन्न किया और महान् अपनी नीति के वैभव से हमारी बुद्धियों को अत्यन्त मोह में डाल दिया, जिससे वे (हमारी बुद्धियाँ) अपने विश्वसनीय व्यक्तियों पर भी विश्वास नहीं करती हैं ॥ २६ ॥

टिप्पणीअतिशयितुम्—उल्लङ्घयितुम् । प्रशस्यतर—अधिक श्रेष्ठ । अतिशयेन प्रशस्य इति प्रशस्यतर प्रशस्य + तरप् । महात्मना—महान् आत्मा यस्य स महात्मा, तेन । न गले पद कृत्वा—हमारे कण्ठ पर पैर रखकर अर्थात् हमारी अवहेलना करके । यह लोकोक्ति है । बलात्—अत्र हेतौ ल्यब्लोपे कर्मणि वा पञ्चमी । स्वेषु वर्गेषु—भद्रभटादिषु । इस श्लोक में दीपक, अति-