मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ मुद्राराक्षसम्
√दुष् + णिच् + ल्युट् भावे, 'दोषो णौ' इत्यनेन ऊत्त्वम् = दूषणम्, तस्मै । 'तुमर्थाच्च भाववचनात्' इति सूत्रेण चतुर्थी अथवा 'क्लृपि सम्पद्यमाने च' इति वार्तिकेन चतुर्थी । इस श्लोक में विषमालंकार है, प्रसाद गुण है, वैदर्भी रीति है और वसन्ततिलका छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥३१॥
राजा—आर्य वैहीनरे ! अद्य प्रभृत्यनादृत्य चाणक्य चन्द्रगुप्त स्वयमेव राज्यकार्याणि करिष्यतीति गृहीतार्थाः प्रकृतयः क्रियन्ताम् ।
कञ्चुकी—[ स्वगतम् ] कथ निरुपपद एव चाणक्यो नार्यचाणक्य इति । हन्त ! सत्यमेव हृतोऽधिकार । अथवा न खल्वन वस्तुनि देव-दोष । कुत —
स दोष सचिवस्यैव यदसत् कुरुते नृप । याति यन्तु प्रमादेन गजो व्यालत्ववाच्यताम् ॥ ३२ ॥
अन्वय—नृप यत् असत् कुरुते स सचिवस्यैव दोष । यन्तु प्रमादेन गज व्यालत्ववाच्यता याति ॥३२॥
व्याख्या—नृप—राजा, यत्, असत्—अयुक्तम् अमात्यतिरस्कारादिरूप कार्यमिति यावत्, कुरुते—विदधाति, स , सचिवस्यैव—अमात्यस्यैव, दोष—अपराध न तु राज्ञ इत्यर्थ । यन्तु—हस्तिपकस्य, प्रमादेन—अनवधानतया, गज—हस्ती, व्यालत्ववाच्यता—व्यालत्वेन दुष्टगजत्वेन वाच्यता निन्दनीयता, याति—प्राप्नोति ॥३२॥
हिन्दी अनुवाद—राजा—आर्य वैहीनरि ! आज से चाणक्य का अनादर करके चन्द्रगुप्त स्वयं ही राज-काज करेगा—इस बात से प्रजाओं को अवगत करा दो ।
कञ्चुकी—[ मन में ] क्यों बिना ( किसी ) आदरसूचक विशेषण के ही 'चाणक्य' ( कहा ), 'आर्य चाणक्य' नहीं ( कहा ) । हाय ! सचमुच अधिकार छीन लिया । अथवा इस विषय में महाराज का दोष नहीं है। क्योंकि—
राजा जो अनुचित ( कार्य ) करता है, वह मन्त्री का ही दोष है । (क्योंकि) महावत की असावधानी से हाथी दुष्ट हाथी होने की निन्दा को प्राप्त होता है ॥३२॥
टिप्पणी—इति गृहीतार्थाः—इति अनेन प्रकारेण गृहीत परिज्ञात...