मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः २४७.
कदाचित् अत्यन्त अभिमानी चाणक्य को सहन न करता हुआ चन्द्रगुप्त (उसे) मन्त्रि-पद से च्युत कर दे, तदनन्तर नन्द-वंश की भक्ति के कारण यह नन्द-वंश का ही है—यह समझकर तथा (चन्दनदास आदि) मित्रों की अपेक्षा के कारण अमात्य राक्षस चन्द्रगुप्त के साथ सन्धि कर ले, और चन्द्रगुप्त भी पितृ-परम्परा से आया हुआ ही यह है—यह सोचकर सन्धि का अनुमोदन करे तो ऐसी स्थिति में हम लोगों पर भी कुमार विश्वास न करें—यह इनके वाक्य का तात्पर्य है।
मलयकेतु—ठीक है। मित्र भागुरायण ! अमात्य राक्षस के घर का मार्ग बताओ।
भागुरायण—इधर से कुमार (आवें) इधर से। [दोनों घूम जाते हैं।] कुमार ! यह अमात्य राक्षस का घर है, कुमार प्रवेश करे।
मलयकेतु—यह प्रवेश करता हूँ। [दोनों प्रवेश करने का अभिनय करते हैं।]
राक्षस—[मन में] ओह ! स्मरण आ गया। [प्रकट] भद्र ! क्या तुम कुसुमपुर में वैतालिक स्तनकलस से मिले थे ?
करभक—अमात्य ! और क्या ?
मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! कुसुमपुर का वृत्तान्त चल रहा है ! इसलिए हम दोनों समीप नहीं जाते, (यहीं से) तब तक सुनते हैं—
मंत्री लोग प्रभाव के नष्ट हो जाने के भय से राजाओं के सामने (किसी बात को) दूसरे ढंग से कहते हैं और प्रकट तात्पर्य वाली स्वच्छन्द बातचीतों में अन्य प्रकार से (कहते हैं) ॥८॥
टिप्पणी—एवमेतत्, किन्तु—भागुरायण चाणक्य का गुप्तचर है। वह राक्षस और मलयकेतु में फूट डालना चाहता है। फूट या भेद का लक्षण यह है—'स्नेहापरागानयनं संघर्षोत्पादनं तथा। संतर्जनं च भेदज्ञैर्भेदस्तु त्रिविधः स्मृतः॥' यहाँ भागुरायण ने 'स्नेहापरागानयन' भेद का प्रयोग किया है।
बद्धवैरः—धृतविद्वेषः। बद्धं वैरं येन स बद्धवैरः। अतिजितकाशिनम्—अनल्पमदशालिनम्। अतिजितेन अतिजयेन काशते तच्छीलः इति अतिजित