भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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गया है वह बाधिसत्वो से अधिक उत्तम॒ है तथा चतुर्थ शताब्दी की ही देन प्रतीत होती है —

‘बुद्धानामपि चेष्टित सुचरितै क्लिष्ट विशुद्धात्मना ॥’'७।१५॥

चतुर्थ एव पञ्चम शताब्दी मे गुप्तवंशीय वैष्णव-नरेश इस मत के अनुयायी थे। इसी कारण विशाखदत्त ने भरतवाक्य मे वैष्णव आश्रयदाता गुप्तवश के सम्राट् समुद्रगुप्त अथवा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की ओर सकेत किया है।

मुद्राराक्षस में जिस सामाजिक दशा का चित्रण किया गया है वह चतुर्थ अथवा पञ्चम शताब्दी की ही प्रतीत होती है।

इन आधारो पर भी विशाखदत्त का काल पूर्ववत् ही सिद्ध होता है।

‘मुद्राराक्षस’ नामक नाटक में भरतवाक्य का प्रयोग जिस विलक्षणता के साथ किया गया है वैसा अन्यत्र देखने को नही मिलता। अन्य नाटको में भरत-वाक्य प्राय नायक द्वारा ही कहलवाया गया है किन्तु इस नाटक में नायक के स्थान पर प्रतिनायक द्वारा इसे कहलवाया गया है। चाणक्य को आशीर्वादवचन-दाता के रूप में चित्रित कर दिये जाने के पश्चात् भरतवाक्य कहने के लिये चन्द्रगुप्त का नम्बर आता है। चाणक्य चन्द्रगुप्त तथा राक्षस दोनो ही से एक साथ पूछता है —

“भो राजन् चन्द्रगुप्त !, भो अमात्य राक्षस !, उच्यता कि वा भूयः प्रियमुपकरोमि ?”

यह पूछे जाने पर चन्द्रगुप्त को भरतवाक्य कहने का पूर्ण अवसर प्राप्त था किन्तु लेखक द्वारा चन्द्रगुप्त से भरतवाक्य की पूर्वपीठिका मात्र ही प्रस्तुत कराई जाती है तथा प्रतिनायक राक्षस द्वारा भरतवाक्य। संस्कृत नाटक-साहित्य में सम्भवत ऐसा उद्धरण नहीं मिलेगा। भरतवाक्य के कहने की तैयारी चन्द्र-गुप्त करता है किंतु उसे प्रस्तुत करता है राक्षस। इसका एकमात्र कारण यही हो सकता है कि लेखक भरतवाक्य के अन्तिम चरण में “पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः” पाठ अवश्य रखना चाहता है। यह तभी सम्भव था कि जब इसे चन्द्रगुप्त के मुख से न कहलवाकर राक्षस के मुख से ही कहलवाया जाता। यदि यह पाठ न रखकर चन्द्रगुप्त से ‘राजन्’ शब्द के द्वारा राज सामान्य का वर्णन कराया जाता