मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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डा० जायसवाल के इस मत से प्रो० हिलेब्रेण्ट (Hillebrandt), स्पेयर (Speyer) और टोने (Towney) भी सहमत हैं।
M कृष्णमाचार्य ने भी अपनी पुस्तक 'History of Classical Sanskrit Literature' मे इसी मत का प्रतिपादन किया है। प्रो० स्टेन कोनो (Sten Konow) ने भी इसी को प्रामाणिक माना है। श्री आर० एस० पण्डित तथा सी० आर० देवधर ने भी इसी का अनुमोदन किया है।
नाटककार विशाखदत्त की दूसरी कृति "देवीचन्द्रगुप्त" मानी गयी है। इसके उपलब्ध अंशो के आधार पर ज्ञात होता है कि नाटककार ने इसमें तीन पात्रों के चरित्र पर विशद रूप से प्रकाश डाला है—(१) राजा, (२) रानी तथा (३) राजकुमार चन्द्रगुप्त। इस प्रकार का चित्रण उसी व्यक्ति के द्वारा किया जाना सम्भव है जो कि या तो स्वयं उस राजदरबार में विद्यमान हो और सम्बन्धित व्यक्ति से भली भांति परिचित हो अथवा उस व्यक्ति द्वारा किया जाना सम्भव है जिसका काम केवल प्रशंसा करना मात्र ही है तथा आवश्यकता-नुसार जिसे कुमार के चरित्र को निर्दोष एवं उत्कृष्ट बनाना है जो कि आगे चलकर राजगद्दी पर आसीन होता है। जो भी हो—इस नाटक के अध्ययन से तो स्पष्ट हो ही जाता है कि यह 'देवीचन्द्रगुप्त' नाटक ऐसे व्यक्ति द्वारा लिखित है जो कि सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन था। अतः इस आधार पर भी विशाखदत्त का स्थितिकाल पूर्ववत् ही सिद्ध होता है।
**बहिर्साक्ष्य—**इसके आधार पर भी लगभग उपर्युक्त समय की ही पुष्टि हो जाती है। श्री भोज ने अपने 'सरस्वती कण्ठाभरण' मे, जिसका रचना-काल ११वीं शताब्दी स्वीकार किया गया है, मुद्राराक्षस के निम्नलिखित दो पद्यों को उद्धृत किया है —
"उपरिघन घनरटित दूरे दयिता किमेतदापतितम्। हिमवति दिव्योपधय शीर्षे सर्प समाविष्ट ॥—मुद्रा० १।२२ और सरस्वती०—३।८७॥
तथा—
प्रत्यग्रोन्मेषजिह्मा क्षणमनभिमुखी रत्नदीपप्रभा इत्यादि। —मुद्रा० १।२१वां श्लोक तथा सरस्वती० १।६८॥