भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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से ४११ ई० तक की थी। इसी बीच वे बुद्ध भगवान् की पावन-भूमि के दर्शन तथा बौद्ध धर्म की पुस्तको की खोज में भारत भी आये थे। वे लगभग ७ वर्षों तक भारत का भ्रमण कर तथा अनेक बहुमूल्य पुस्तकों और मूर्तियों को लेकर अपने देश लौट गये। उन्होंने पाटलिपुत्र को मगध की राजधानी के रूप मे देखा था—ऐसा उन्होंने लिखा है। इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में जो बौद्ध धर्म की ओर (७।५ मे) संकेत है, उससे यह ज्ञात होता है कि उस समय बौद्ध धर्म का अभ्युदय काल था। यही दशा फाह्यान के भारत आने के समय भी थी।

इसके अनन्तर दूसरा चीनी यात्री ह्वेनसांग ( Hiunen-Tsang ) भी भारत मे आया। उसकी यात्रा ६४६-६६६ ई० के मध्य रही। वह १५ वर्ष तक यहाँ रहा। उसने मगध की राजधानी पाटलिपुत्र का वर्णन भग्नावशेष रूप में किया है।

इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि छठी अथवा सप्तम शताब्दी में पाटलिपुत्र की दशा, प्रतिष्ठा वह नही रह गई थी जिसका वर्णन मुद्राराक्षस में उपलब्ध होता है। अतः फाह्यान द्वारा लिखित पाटलिपुत्र की दशा के उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि मुद्राराक्षस की रचना चतुर्थ शताब्दी के अन्त में अथवा पञ्चम शताब्दी के प्रारम्भ में हुई होगी। पुन इसी आधार पर नाटककार विशाखदत्त का स्थितिकाल भी यही मानना होगा।

जीवन-वृत्त

काल-वर्णन के प्रारम्भ मे ही उद्धृत प्रस्तावना के अंश से स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार का नाम विशाखदत्त ही था। इनके पिता का नाम भास्करदत्त तथा पितामह का नाम वटेश्वरदत्त था। 'मुद्राराक्षस' की कुछ प्रतियो में "महाराज भास्करदत्तसूनो" के स्थान पर 'महाराजपदभाक्पृथुसूनो' पाठ भी मिलता है। इसी आधार पर प्रो० विल्सन ने लेखक के निवासस्थान का निर्णय इस प्रकार किया है कि महाराज पृथु और अजमेर के पृथुराज अथवा पृथुराय एक ही हैं। किन्तु आगे चलकर उन्होंने स्वयं ही यह संकेत भी दिया है कि 'वटेश्वरदत्त' में प्रयुक्त 'दत्त' शब्द इस निर्णय में कठिनाई उपस्थित करता है। श्री तैलंग महोदय ने उपर्युक्त कल्पना का विरोध करते हुये यह मत अभिव्यक्त किया है कि