मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३१६
क्या मैं तपोवन में चला जाऊँ ? वैरभाव से युक्त मन तपस्या से शान्त नहीं होगा । शत्रु के जीवित रहने पर क्या स्वामी का अनुकरण करूँ ? यह तो अबलाओं का काम है । अथवा क्या तलवार लेकर शत्रुदल में कूद पडूँ । नही, यह अच्छा नहीं होगा । (क्योंकि) चन्दनदास को छुड़ाने में व्यग्र (मेरा) मन रोकेगा । यदि नही (रोकेगा तो वह) कृतघ्न होगा ॥ २४ ॥
[ सभी (पात्र) बाहर चले जाते हैं । ]
॥ पाँचवाँ अंक समाप्त ॥
टिप्पणी—तोपि घातिताः—यहाँ अपि शब्द समुच्चयार्थक है, अर्थात् मेरे स्वामी और मित्र सब मारे गए । तत् किमिदानीम्—मेरे सभी प्रयत्न मुझे ही हानि पहुँचा रहे हैं, इसलिए अब क्या करूँ । किं गच्छामि—इस श्लोक में निराश होकर राक्षस सोच रहा है कि क्या मैं तप करने के लिए बन में चला जाऊँ अथवा क्या स्वामी का अनुगमन करने के लिए आत्महत्या कर लूँ अथवा तलवार लेकर शत्रुओं पर टूट पडूँ । इन सभी विकल्पों के बाद वह निश्चय करता है कि नहीं, ऐसा करने से मैं चन्दनदास के प्रति कृतघ्न हो जाऊँगा । इसलिए अब उसे छुड़ाने का ही प्रयत्न करूँगा । इस पद्य में दीपक अलंकार और वाक्यार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार का सांकर्य है । इसमें शार्दूल-विक्रीडित छन्द है । उक्त छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ २४ ॥
षष्ठोऽङ्कः
[ ततः प्रविशत्यलङ्कृतः सहर्षः सिद्धार्थकः । ]
सिद्धार्थकः—
जअदि जगदणीलो केसवो केसिघादी जअदि अ जगदिट्ठो चन्दमा चन्दउत्तो । जअदि जअणसज्जं जा अकाऊण सेण्णं पडिहदपरपक्खा अज्जचाणक्कणीदी ॥ १ ॥