मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३६७
स्तपस्वीति । भवतु, पृच्छाम्येनम् [ प्रकाशम् ] भद्र ! व्यसनसब्रह्मचारिन् ! यदि न गुह्यं, नातिभारिकं वा; ततः श्रोतुमिच्छामि किं ते प्राणपरित्यागकारणम् ?
पुरुषः—[ निरूप्य ] अज्ज ! ण रहस्सं, ण वा अतिगुरुअं; किन्तु ण सक्कणोमि प्पिअबअस्सविणासदुक्खिदहिअओ एत्तिअमत्तम्पि मरणस्स कालहरणं कादुं । ( आर्य ! न रहस्यं, न वाऽतिगुरुकं, किन्तु न शक्नोति प्रियवयस्यविनाशदुःखितहृदय एतावन्मात्रमपि मरणस्य कालहरणं कर्तुम् । )
राक्षसः—[ निःश्वस्याऽऽत्मगतम् ] कष्टमेतेषु सुहृद्व्यसनेषु परवदुदासीनाः प्रत्यादिश्यामहे वयमनेन । [ प्रकाशम् ] भद्र ! यदि न रहस्यं, नाऽतिगुरुकं वा, तत् पुनः श्रोतुमिच्छामि । कथ्यतां का गतिः दुःखस्येति ?
**हिन्दी अनुवाद—पुरुष—**यह बैठा हुआ है । इसलिए अब आर्य चाणक्य की आज्ञा को सम्पन्न करता हूँ । [ राक्षस को न देखते हुए की तरह उसके आगे रस्सी के फन्दे से गले को बाँधता है । ]
राक्षस—[ देखकर मन में ] अरे ! क्यो यह अपने को बाँध रहा है ? निश्चित ही यह बेचारा मेरी तरह दुःखी है । अच्छा, पूछता हूँ इससे । [ समीप जाकर प्रकट रूप से ] भद्र ! भद्र !! यह क्या कर रहे हो ?
पुरुष—[ आँसू के साथ ] आर्य ! जो प्रिय मित्र के विनाश से दुःखी मेरे जैसा अभागा व्यक्ति करता है ।
राक्षस—[ मन में ] पहले ही मैंने समझ लिया कि यह बेचारा निश्चित रूप से मेरे समान दुःखी है । अच्छा, पूछता हूँ इससे । [ प्रकट ] भद्र ! समान विपत्ति वाले ! यदि गोपनीय न हो, अथवा बहुत महान् न हो तो सुनना चाहता हूँ कि तुम्हारा प्राणत्याग करने का कारण क्या है ।
पुरुष—[ देखभाल कर ] आर्य ! गोपनीय नही है या अत्यन्त महान् नही है, किन्तु प्रिय मित्र के विनाश से दुःखी हृदय वाला मैं मरने के समय को इतना भी गँवाने के लिए समर्थ नही हूँ ।