मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽङ्कः ४१६
व्याख्या—वाहनहस्तिभ्यां—अश्वगजाभ्यां, सह—साकं, सर्वबन्धनम्—सर्वेषां समेषां बन्धनं संयमनं, मुच्यताम्—अपनीयताम्। पूर्णप्रतिज्ञेन—पूर्णा सफला प्रतिज्ञा प्रतिश्रुतिः यस्य तथाविधेन, मया—चाणक्येन, केवलं—मात्रं, शिखा—चूडा, बध्यते—संयम्यते ॥१८॥
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—विजये ! दुर्गपाल और विजयपाल कहो कि अमात्य राक्षस के मिल जाने से प्रसन्न महाराज चन्द्रगुप्त आज्ञा देते हैं कि हाथियों और घोड़ो को छोड़कर सब के बन्धन खोल दिये जायं। अथवा अमात्य राक्षस के मंत्री होने पर हाथी-घोड़े का क्या काम ? इसलिए अब—
हाथियों और घोड़ों के साथ सब का बन्धन खोल दिया जाय। पूर्ण प्रतिज्ञा वाला मैं केवल शिखा बांधता हूँ ॥१८॥
[ शिखा बाँधता है। ]
प्रतिहारी—जो आर्य की आज्ञा।
[ बाहर चली जाती है। ]
टिप्पणी—हस्त्यश्वम्—हस्तिनश्च अश्वाश्च इति हस्त्यश्वम् द्वन्द्वसमासे कृते 'द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्' इति सूत्रेण एकवद्भावः। प्रयोजनम्—प्रयोज्यते अनेन इति प्र√युज्+णिच्+ल्युट् करणे = प्रयोजनम्। वाहन—उह्यते अनेन इति √वह्+ल्युट् करणे, निपातनात् वृद्धिः = वाहनम् = अश्वः। पूर्णप्रतिज्ञेन—जिसकी प्रतिज्ञा पूरी हो चुकी है। नन्दवंशोन्मूलन के बाद चाणक्य की प्रतिज्ञा थी कि राक्षस को चन्द्रगुप्त से मिलाकर मौर्य की लक्ष्मी को स्थिर करना। वह अब पूरी हो चुकी है। इसलिए वह अपने को पूर्णप्रतिज्ञ कहता है और शिखा भी बांध लेता है। इस श्लोक में एक ही शिखा में विरूप बन्धन और मोचन की संघटना होने से विषमालंकार है। इसमें भी अनुष्टुप् छन्द है ॥१८॥
चाणक्यः—अमात्यराक्षस ! तदुच्यतां, किं ते भूयः प्रियमुपकरोमि ?
राक्षसः—किमतः परमपि प्रियमस्ति ? यदि न परितोषस्तदिदमस्तु—
[ भरत-वाक्यम् ]
वाराहीमात्मयोनेस्तनुमतनुबलामास्थितस्यानुरूपां
यस्य प्राग्दन्तकोटिं प्रलयपरिगता शिश्रिये भूतधात्री।