भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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उनका भाषा सम्बन्धी लालित्य एव माधुर्य भी दर्शनीय है । कुछ उदाहरण देखिये —

(१) न प्रयोजनमन्तरा चाणक्यः स्वप्नेऽपि चेष्टते । — ३।१६ के पश्चात् चाणक्य की उक्ति ।

(२) तन्मयाप्यस्मिन् वस्तुनि न शयानेन स्थीयते । — १।१५ के पश्चात् ।

(३) अयमपरो गण्डस्योपरि स्फोटः । — ५।२१ के अनन्तर कही गई राक्षस की उक्ति ।

(४) ननु वक्तव्य राक्षस एवास्मदङ्गुलिप्रणयी संवृत्त । — १।१६ के अनन्तर चाणक्य की उक्ति ।

(५) कीदृश पुन तृणानामग्निना सह विरोधः । — १।२१ के पश्चात् चन्दनदास की उक्ति ।

इस प्रकार की कोमलकान्त पदावलि सभी सहृदय पाठकों के चित्त को अवश्य ही अपनी ओर आकर्षित करने में समर्थ कही जा सकती है ।

छन्द—छन्दों का चयन भी विलक्षण ही है । मुद्राराक्षस में १६ प्रकार के छन्दों का प्रयोग हुआ है जिनमें स्रग्धरा, शिखरिणी, शार्दूलविक्रीडित, वसन्ततिलका और अनुष्टुप् को प्रमुख कहा जा सकता है । प्रत्येक छन्द का प्रयोग मात्र विषय के प्रकाशन हेतु ही नहीं हुआ है अपितु किसी औचित्य की दृष्टि से अथवा किसी औचित्य की सिद्धि के निमित्त ही प्रयुक्त हुआ है । स्रग्धरा छन्द का प्रयोग मुद्राराक्षस में १७ स्थानों पर हुआ है । विषय की दृष्टि से उनका औचित्य प्रशंसनीय ही है । उदाहरण के लिये प्रथम अङ्क के प्रारम्भिक नान्दी सम्बन्धी दो श्लोकों को ही ले लीजिये । 'शिव के शाठ्य' एवं 'ताण्डव-नृत्य के अभिनय' सदृश गभीर और असाधारण विषय का संगीतमय ध्वनि में गम्भीर स्वर लहरी के साथ अभिव्यक्त किया जाना 'स्रग्धरा' जैसे छन्द द्वारा ही सम्भव था । शार्दूलविक्रीडित नामक छन्द का प्रयोग भी २८ बार हुआ है । "श्यामीकृत्या-ननेन्दुम् इत्यादि १।११ श्लोक का भाव शार्दूलविक्रीडित छन्द के अतिरिक्त यदि किसी अन्य छन्द द्वारा अभिव्यक्त किया गया होता तो सम्भवतः चाणक्य का