मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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कारण "यच्चद्वयग्गलणवुल्छृद्धाश्च" के अनुसार नपुंसक लिङ्ग होकर 'मुद्राराक्षसम्' पद बना है। अथवा—मुद्रया गृहीतः राक्षसः यस्मिन् तत् मुद्राराक्षसम्—व्युत्पत्ति भी की जा सकती है।
नाटककार को नाटक का उक्त नाम रखने की प्रेरणा सम्भवत महाकवि शूद्रक के 'मृच्छकटिक' अथवा महाकवि कालिदास के 'अभिज्ञानशाकुन्तल' से प्राप्त हुई होगी। 'मृच्छकटिक' नाटक का नायक चारुदत्त है किन्तु इसके चरित-चित्रण मे मिट्टी की गाड़ी ( मृच्छकट ) की जो घटना है उसका अपना एक विशिष्ट महत्त्व है। इसी घटना के आधार पर नाटककार ने चारुदत्त का पूर्वा पर चरित परस्पर संश्लिष्ट रूप से चित्रित किया है। 'अभिज्ञानशाकुन्तल' मे भी अभिज्ञान—अँगूठी की पहचान से शकुन्तला की पहचान की घटना अपना विशेष महत्त्व रखती है और यही वह घटना है जो कि नायक दुष्यन्त के पूर्वा-पर चरित का समन्वय करती है। इसी भाँति मुद्राराक्षस नाटक मे भी मुद्रा द्वारा राक्षस के पकड़े जाने की घटना एक ऐसी घटना है जिस पर इस नाटक के नायक (चाणक्य) की सम्पूर्ण कूटनीति आधारित है।
नाटककार इस नाटक का अन्य नाम भी रख सकता था किन्तु वे इतने अधिक आकर्षक नहीं हो सकते थे। अत पाठको एव दर्शकों के आकर्षण की दृष्टि से नाटककार ने 'मुद्राराक्षस' यह नाम उचित तथा सार्थक ही रखा है।
मुद्राराक्षस के कथानक का मूल अथवा मुद्राराक्षस के इतिवृत्त का आधार—
विष्णुपुराण, भागवत तथा अन्य पुराणों में भी कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा नन्दवंश के सर्वनाश तथा चन्द्रगुप्त मौर्य की साम्राज्य-प्रतिष्ठा का वर्णन स्पष्ट शब्दो मे उपलब्ध होता है। इतिहास-लेखको के अनुसार नन्द-वंश का अन्तकाल ईस्वी सन् से ३२६ वर्ष पूर्व माना गया है। उस समय से लेकर नाटककार के समय तक लगभग ८०० वर्षों के अन्दर चाणक्य एव चन्द्रगुप्त से सम्बन्धित अनेक किंवदन्तिया चारों ओर फैल चुकी थी। नाटककार इन किंवदन्तियो से अवश्य परिचित रहा होगा किन्तु नाटकीय इतिवृत्त में किसी किंवदन्ती का कोई संकेत उपलब्ध नहीं होता। नन्द-विनाश के निमित्त एक स्थल (अंक ४।१२)