मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
पृष्ठ 73, कुल 488 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७० )
जिसके अभाव में नाटक का कथानक अपूर्ण न रह जाता हो। इस नाटक में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जिसकी कि अपनी स्वतन्त्र सत्ता हो। सभी कार्य परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। कथावस्तु की ऐसी सफल तथा चातुर्यपूर्ण योजना सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य के नाटकों में कठिनता से ही उपलब्ध होगी। सम्पूर्ण योजना का गठबन्धन ऐसा सुसम्बद्ध दृष्टिगोचर होता है कि कहीं भी शिथिलता का दर्शन होना सम्भव नहीं है। प्रो० वेबर के मतानुसार सम्पूर्ण संस्कृत-साहित्य में घटना-सामञ्जस्य का इससे उत्तम उदाहरण मिलना सर्वथा असम्भव ही है।
विशाखदत्त ने अङ्कों का विभाजन दृश्यों के आधार पर किया है। उनकी यह अपनी मौलिकता है। अन्य नाटकों में अङ्कों का विभाजन पात्रों को आधार मान कर किया गया है। प्रमुख पात्र प्रारम्भ से अन्त तक रङ्गमञ्च पर प्रायः बने रहते हैं। किन्तु मुद्राराक्षस में ऐसा नहीं हुआ है। इसमें दृश्यों को आधार मानकर अङ्कों का विभाजन किया गया है। इस दृष्टि से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कथावस्तु की योजना के साथ ही साथ दृश्य विधान भी विलक्षण तथा सुव्यवस्थित है।
मुद्राराक्षस का नेता (नायक)
इस नाटक में 'नेता' विषयक प्रश्न विवादास्पद है। कुछ विद्वान् इसका नेता (नायक) चन्द्रगुप्त को मानते हैं तथा कुछ चाणक्य को। चाणक्य को नेता मानने वालों की संख्या अधिक है।
साहित्य-शास्त्रीय सिद्धान्त के अनुसार फल का भोक्ता (अथवा प्राप्तिकर्त्ता) ही नेता कहलाता है। परम्परा भी इसी प्रकार की चली आ रही है। मुद्राराक्षस में भी फल का भोक्ता चन्द्रगुप्त है, राक्षस उसी का मन्त्री बनता है तथा अपनी सेवाओं को उसने चन्द्रगुप्त को ही अर्पित किया है। इसके विपरीत चाणक्य का अस्तित्व चाणक्य रूप में ही अवशिष्ट रह गया है। इस आधार पर कुछ विद्वानों ने चन्द्रगुप्त को ही मुद्राराक्षस का नायक स्वीकार किया है।
अधिकांश विद्वानों का कथन है कि परम्परा की दृष्टि से चन्द्रगुप्त को भले ही नेता मान लिया जाय किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से नेता के बारे में विचार करने पर