मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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नाटक की प्रस्तावना में :—
“क्रूरग्रहः सकेतुः सम्पूर्णमण्डलमिदानीम्। अभिभवितुमिच्छति बलात्”
इन शब्दों को श्रवणकर और यह समझकर कि “शत्रु चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करना चाहता है” उसका क्रोध जाग्रत हो जाता है और वह तडपता हुआ कहने लगता है :—
“आः क एष मयि स्थिते चन्द्रमभिभवितुमिच्छति ?”
वह निरीह तथा स्वार्थहीन व्यक्ति है। इतने बड़े साम्राज्य का प्रधान मन्त्री होने पर भी उसे अपने मुख-समृद्धि की चिन्ता नहीं है। “सादा जीवन उच्च विचार” ही उसके जीवन का लक्ष्य है। चन्द्रगुप्त के कंचुकी के शब्दों में उसकी इस विशेषता का स्पष्ट परिचय मिलता है :—
“अहो ! राजाधिराजमन्त्रिणो गृहभूतिः !!-कुतः।
उपलशकलमेतद्भे दकं गोमयानां
वटुभिरुपहृतानां बर्हिषां स्तोम एषः।
शरणमपि समिद्भिः शुष्यमाणाभिरभि—
विनमितपटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड्यम् ।।” ३।१५।।
निरीहाणामीशस्तृणमिव तिरस्कारविषयः ।।” ३।१६।।
उसने अपने प्रयत्न से समूल नन्दवंश का नाश कर चन्द्रगुप्त मौर्य को गद्दी पर बिठा दिया किन्तु फिर भी स्वयं निर्लिप्त ही रहा।
वह दैव (भाग्य) में विश्वास नहीं करता है। चन्द्रगुप्त के मुख से जब वह यह सुनता है कि नन्दवंश का विनाश दैव ने किया ( श्लोक सं० ३।२६ से पूर्व ) तो वह कहता है :—
“दैवमविद्वांसः प्रमाणयन्ति”।
इसके साथ ही उसे अपने पुरुषार्थ पर ही पूर्ण विश्वास है।
वह गुणग्राहक भी है। शत्रु के गुणों की भी प्रशंसा वह निःसंकोच भाव से करता है। वह राक्षस के गुणों से पूर्णतया प्रभावित है। इसीलिये वह यह जानता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधान मन्त्री यदि राक्षस को बना दिया जायेगा तो उसका शासनकाल पूर्ण शान्ति तथा निश्चिन्तता से बीतेगा तथा कोई अन्य राजा