भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 488 में से

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पृष्ठ 82

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"देव" को ही मानता है, चाणक्य को नहीं—"देवं हि नन्दकुलशत्रुरसौ न विप्रः ॥" ६।७॥ इत्यादि ।

राक्षस में जहाँ इतने गुण हैं वहाँ उसमें कुछ कमियाँ भी हैं। वह दूसरों पर शीघ्र ही विश्वास कर लेता है। इसी कारण उसे पराजय का भी सामना करना पड़ा है। यदि वह सिद्धार्थक तथा जीवसिद्धि पर विश्वास न करता तो उसकी पराजय न हुई होती। उसमें अधिकतर उतावलापन भी दृष्टिगोचर होता है। बीती हुई घटना का विराघगुप्त द्वारा श्रवण करते-करते ही वह वर्तमान काल में उसे समझकर एकाएक कहने लगता है—

राक्षसः—[ शस्त्रमाकृष्य ससम्भ्रमम् ] मयि स्थिते कः कुसुमपुरमुपरोत्स्यति ? प्रवीरक ! प्रवीरक ! क्षिप्रमिदानीम्—

"प्राकारं परितः शरासनधरैः क्षिप्रं परिक्रम्यताम् द्वारेषु द्विरदैः प्रतिद्विपघटाभेदक्षमैः स्थीयताम् । त्यक्त्वा मृत्युभयं प्रहर्तुमनसः शस्त्रोर्बले दुर्बले ते निर्यान्तु मया सहैकमनसो येषामभीष्टं यशः ॥२।१३॥"

चाणक्य एवं राक्षस का तुलनात्मक चरित्र-चित्रण

नाटककार विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में पात्रों का चरित्र प्रायः विरोध की पृष्ठभूमि के साथ चित्रित हुआ है। किन्तु उनका यह विरोध नाटककार की कल्पना-मात्र ही न होकर पात्रों की स्वाभाविकतापूर्ण चारित्रिक विशेषताओं से युक्त है। चाणक्य एवं राक्षस के चरित्र सम्बन्धी तुलनात्मक विवेचन में दोनों के साधर्म्य एवं वैधर्म्य की ओर दृष्टिपात करना आवश्यक है। पहले दोनों के साधर्म्य के बारे में विचारना उचित होगा—

कुल की दृष्टि से दोनों ही ब्राह्मण-कुल की शोभा हैं। दोनों ने अत्यन्त साहसपूर्ण योजनाओं का निर्माण किया है किन्तु साधनों की चिन्ता कभी नहीं की। चाणक्य चन्द्रगुप्त के राज्य को तथा राक्षस मलयकेतु को नन्दों की राजगद्दी पर आसीन कर उसे दृढ़ बनाने हेतु कृतसंकल्प हैं। एतदर्थ दोनों के द्वारा किये गये प्रयास पूर्णतया निःस्वार्थ हैं। दोनों कर्तव्यनिष्ठ होने के साथ ही साथ पूर्ण राजनीतिज्ञ, साहसी तथा बहुविध-साधन-सम्पन्न हैं। अपने-अपने उद्देश्यों की

मु० रा० भू०—६

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