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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

सप्तमोऽङ्कः

४२१

धारण किये हुए विष्णु ) की दोनों भुजाओं का आश्रय लिया है, वह श्री-सम्पन्न बन्धुओं एवम् अनुचरों वाला राजा चन्द्रगुप्त चिरकाल तक पृथिवी की रक्षा करे ॥१६॥

[ सभी ( पात्र रंगमंच से ) चले जाते हैं । ]

॥ मुद्राराक्षस ( नामक नाटक ) में सातवाँ अंक समाप्त ॥

टिप्पणीभरतवाक्यम्—नाटक के अन्त में आशीर्वाद रूप में गाया जाने वाला पद्य । भूतधात्री—भूतानां प्राणिनां धात्री जननी = पृथिवी । वाराहीम्—वराहः शूकरः तस्य इयम् इति वराह + अण् + ङीप् = वाराही, ताम् । आत्मयोनेः—आत्मा स्वयमेव योनिः कारणमस्य इति आत्मयोनिः, तस्य । शिश्रिये—√श्रिधातुः उभयपदी । अत्र कर्त्रभिप्राये क्रियाफले आत्मनेपदम् । उद्वेज्यमाना—उद् √विज् + णिच् + शानच् कर्मणि । कई पुस्तकों में 'उद्विज्यमाना' पाठ है । वह अशुद्ध है; कारण विज् धातु अकर्मक है । उससे कर्म में शानच् कैसे हो सकता है ? अतएव णिजन्त से कर्म में शानच् करना चाहिए । राजमूर्तेः—पुरा वाराहीं तनुम् आस्थितस्य अधुना राजमूर्तेः । संश्रिता—सम् √श्रि + क्त कर्तरि वर्तमाने । 'ग्रन्थादौ ग्रन्थमध्ये ग्रन्थान्ते च मङ्गलमाचरेत्' इस शिष्टाचार के अनुसार इस ग्रन्थ के आदि में 'धन्या केयम्' श्लोक से, मध्य में 'आकाशं काशपुष्पम्' श्लोक से और अन्त में 'वाराहीम्' इस प्रकृत श्लोक से कवि ने मंगलाचरण किया है ॥१६॥

एषा मदीया सरला सुबोधा व्याख्या प्रिया मन्दधियामपि स्यात् ।
विभाव्य पूर्णेयमिति श्रमेण प्रीत्यै कृता प्रीतिमतोः स्वपित्रोः ॥ १ ॥

गृहीता पूर्वटीकाभ्यो बह्वीभ्यो हि सहायता ।
तासां कृतज्ञताञ्जलिं निर्मातॄणां करोम्यहम् ॥२॥

* श्रीसाम्बसदाशिवार्पणम् *