मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०८ मुद्राराक्षस-
क्षपणक ।—(हस कर) वाह श्रावक वाह ! तुम मूड मुंड कर भा नक्षत्र पूछते हो ?
सिद्धार्थक ।—भला अब क्या बिगडा है ? कहते क्यों नही दिन अच्छा होगा जायगे, न अच्छा होगा फिर आवेंगे।
५ क्षपणक ।—चाहे दिन अच्छा हो या न अच्छा हो, मलयके के कटक से बिना मोहर भए कोई जाने नही पाता।
सिद्धार्थक ।—यह नियम कब से हुआ ?
क्षपणक ।—सुनो, पहिले तो कुछ भी रोक टोक नही थी पर जब से कुसुमपुर के पास आए है तब से यह नियम
१० हुआ है कि बिना मोहर के न कोई जाय न आवै । इस से जो तुम्हारे पास भागुरायण का मोहर हो तो जाओ नही तो चुप बेठ रहो, क्योंकि पीछे से तुम्हें हाथ पैर बधवाना पड़ै ।
सिद्धार्थक ।—क्या यह तुम नही जानते कि हम राक्षस के
१५ अन्तरङ्ग खेलाडी मित्र हैं ? हमें कौन रोक सकता है ?
क्षपणक ।—चाहे राक्षस के मित्र हो चाहे पिशाच के, बिन मोहर के कभी न जाने पाओगे।
सिद्धार्थक ।—भदन्त ! क्रोध मत करो, कहो कि का सिद्ध हो।
२० क्षपणक ।—जाओ, काम सिद्ध होगा, हम भी पटने जाने हेतु मलयकेतु से मोहर लेने जाते हैं।
(दोनों जाते हैं)
॥ इति प्रवेशक ॥
(भागुरायण और सेवक आते हैं)
२५ भागुरायण ।—(आपही आप) चाणक्य की नीति भी बह विचित्र है।