मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम अङ्क । १०६
मनुष्य ।—कुमार की जय हो ! कुमार के कटकद्वार के रक्षा- धिकारी दीर्घचक्षु ने निवेदन किया है कि ‘मुद्रा लिये बिना एक पुरुष कुछ पत्र सहित पकड़ा गया है सो उस को एक बेर आप देख ले ।’
भागुरायण । अच्छा, उस को ले आओ । ५
पुरुष ।—जो आज्ञा ।
(जाता है और हाथ बंधे हुए सिद्धार्थक को लेकर आता है)
सिद्धार्थक । ( आप ही आप )
गुन पै रिझवत, दोस सों, दूर बचावत जौन । स्वामि भक्ति जननी लखिस, प्रनमत नित हम तौन ॥ १०
पुरुष ।—( हाथ जोड़ कर ) कुमार ! यहाँ मनुष्य है।
भागुरायण ।-( अच्छी तरह देख कर ) यह क्या बाहर का मनुष्य है या यही किसी का नौकर है ?
सिद्धार्थक ।—मैं अमात्य राक्षस का पासवर्ती सेवक हूं ।
भागुरायण ।—तो तुम क्यों मुद्रा लिये बिना कटक के बाहर १५ जाते थे ?
सिद्धार्थक ।—आर्य्य ! काम की जल्दी से ।
भागुरायण ।—ऐसा कौन काम है जिस के आगे राजाज्ञा को भी कुछ मोल नहीं गिना ?
सिद्धार्थक ।—( भागुरायण के हाथ मे लेख देता है ) । २०
भागुरायण । -( लेख लेकर देख कर ) कुमार ! इस लेख पर अमात्य राक्षस की मुहर है ।
मलयकेतु ।—ऐसी तरह से खोल कर दो कि मुहर न टूटे ।
भागुरायण ।—( पत्र खोल कर मलयकेतु को देता है) ।
मलयकेतु ।—( पढ़ता है ) स्वस्ति । यथा स्थान में कहीं से २५ कोई किसी पुरुष विशेष को कहता है । हमारे विपत्त को निराकरण कर के सच्चे मनुष्य ने सचाई दिखलाई ।