मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ( अक्षर ) ख । १६३
इसी से बलीपुत्र पुरी इस का नाम हुआ । इसी से पालीपुत्र और फिर पाटलीपुत्र हो गया । पाली भाषा, पाली धर्म, पाली देश इत्यादि शब्द भी इसी से निकले हैं । कहते हैं बाणासुर के बसाए हुए जहा तीन पुर थे उन्हो को जीत कर बलदेव जी ने अपने पुत्रों के हेतु पर निर्माण किए । यह तीनों नगर ५ महाबलीपुर इस नाम से एक मद्रास हाते मे, एक बिदर्भदेश मे ( मुजफ्फरपुर वर्त्तमान नाम ) और एक ( राजमहल वर्त्तमान नाम से ) वङ्गदेश मे है । कोई कोई बालेश्वर, मैसूर, पुरनिया प्रभृति को भी बाणासुर की राजधानी बतलाते हैं । यहा एक बात बड़ी विचित्र प्रकट होती है । बाणासुर भी १० बलीपुत्र है । क्या आश्चर्य है कि पहले उसी के नाम से बली- पुत्र शब्द निकला हो । कोई नन्द ही का नामान्तर महाबली कहते हैं और कहते हैं कि पूर्व मे गङ्गाजी के किनारे नन्द ने केवल एक महल बनाया था, उसके चारों ओर लोग धीरे २ बसने लगे और फिर यह पत्तन ( पटना ) हो गया । कोई १५ महाबली के पितामह उदसी उदासो, उदय, श्रीउदय सिह ( ? ) ने ४५० ई० पू० इस को बसाया मानते हैं । कोई पाटली देवी के कारण पाटलिपुत्र नाम मानते हैं ।
विष्णुपुराण और भागवत में महापद्म के बड़े लडके का नाम सुमाल्य लिखा है । बृहत्कथा मे लिखते हैं कि शकटाल २० ने इन्द्रदत्त का शरीर जला दिया इस से योगानन्द ( अर्थात् नन्द के शरीर मे इन्द्रदत्त की आत्मा ) फिर राजा हुआ । व्याड़ि जाने के समय शकटाल को नाश करने का मन्त्र दे गया था । वररुचि मन्त्री हुआ किन्तु योगानन्द ने मदमत्त हो कर उसको नाश करना चाहा इस से वह शकटार के घर मे २५ छिपा । उस की स्त्री उपकोशा पति को मृत समझ कर सती हो गई । योगानन्द के पुत्र हिरण्यगुप्त के पागल होने पर वररुचि फिर राजा के पास गया था, किन्तु फिर तपोवन में