मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ( अख्तर ) ख । १६५
अजातशत्रु की दुश्मनी बौद्ध मत से धीरे धी बहुत कम हो गयी । शाक्यमुनि गौतम बुद्ध फिर मगध मे गया । पटना उस समय एक गाव था, वहा हरकारों की चौकी में ठहरा । वहा से विशाली (१) मे गया । विशाली की रानी एक वेश्या थी । वहां से पावा (२) गया, वहा से कुशीनार गया । बौद्धों के लिखने बमूजिब उसी जगह सन् ईसवी ५४३ बरस पहले ८० बरस की उमर मे साल के वृक्ष के नीचे बाई करवट लेटे हुए इस का निर्वाण (३) हुआ । काश्यप उस का जानशीन हुआ । अजातशत्रु के पीछे तीन राजा अपने बाप को मार कर मगध की गद्दी पर बैठे, यहा तक कि प्रजा ने घबराकर विशाला की वेश्या के बेटे शिशुनाग मन्त्री को गद्दी पर बैठा दिया । यह बड़ा बुद्धिमान था । इस के बेटे काल अशोक ने, जिस का नाम ब्राह्मणों ने काकवर्ण भी लिखा है, पटना अपनी राजधानी बनाया ।
जब सिकन्दर का सेनापति बावेल का बादशाह सिल्यूकस सूबेदारों के तदारुक को आया, पटने से सिन्धु किनारे तक नन्द के बेटे चन्द्रगुप्त के अमल दखल मे पाया, बड़ा
(१) जैनी महावीर के समय विशाली अथवा विशाला का राजा चेटक * बतलाते हैं, यह जगह पटना के उत्तर तिरहुत में है, उजड गयी है । वहा बाले अब उसे बसहर पुकारते हैं ।
(२) जैनी यहा महावीर का निर्वाण बतलाते हैं, पर जिस जगह को अब पावापुर मानते हैं असल में वह नही है, पावा विशाली से पश्चिम और गंगा से उत्तर होना चाहिए ।
(३) जैन अपने चौबीसवे अर्थात् सब से पिछले तीर्थंकर महावीर का निर्वाण बिक्रम के संवत से ४७०, अर्थात् सन् ईस्वी से ५२७ बरस पहले बतलाते हैं और महावीर के निर्वाण से २५० बरस पहले अपने तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का निवारण मानते हैं ।
* कैसे आश्चर्य की बात है, चेटक रंडी के भडवे को भी कहते हैं (हरिश्चन्द्र) ।