मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७० मुद्राराक्षस—
यदशुभमवलोकनाभिरुक्तं ग्रहजनितं ग्रहणे प्रमोक्षणे वा । सुरपतिगुरुणावलोकिते तच्छममुपयाति जलैरिवाग्निरिद्ध ॥
अर्थ जो ग्रहजनित अशुभफल दृष्टि के वश से ग्रहण और मोक्ष समय मे कहा वह बृहस्पति की दृष्टि होने से शात हो जाता है, जैसे सुलगा हुआ अग्नि जल से शांत होता है। यहा भी उक्त अर्थ से बृहस्पति की दृष्टि है, अत अशुभफल नही हो सकता। यह सूत्रधार का तात्पर्य होगा—ऐसा भी कह सकते है।
उक्त श्लोक का अन्वयसहित अर्थ जो चन्द्रगुप्त के अर्थ को प्रकाश कर के चाणक्य के प्रवेश की प्रस्तावना करता है।
इदानीं सकेतु क्रूरग्रह असम्पूर्णामंडल चन्द्रं बलात् अभिभवितुमिच्छति एनं बुधयोगस्तु रक्षति। इस समय केतु (मलयकेतु) सहित क्रूरग्रह (राक्षस) जिस का मण्डल (राज्य) पूरा नही हुआ है उस चन्द्र (चन्द्रगुप्त) को बलात्कार से पराजय करने चाहता है, प्रभून्क बुद्धिमानों का (गुप्त पुरुष जो चाणक्य के भेजे थे उन का) योग तो रक्षा करता है। एन शब्द की सिद्धि पूर्वप्रकार से ही जानो, केवल भेद इतना ही है कि पहले अर्थ मे इन शब्द से सूर्ये और दूसरे अर्थ मे प्रभु (राजा वा बड़े लोक) लेते है। “इन सूर्ये प्रभौ” नानार्थ-वर्ग अमरकोष मे लिखा भी है।
सारांश—इस लिखित अर्थ पर सब लोक विचार कर के फिर उस के गुण दोषों पर ध्यान देवें इतनी ही प्रार्थना है।
इति शुभम्
$\left.\begin{array}{l}\text{उदयपुर,} \ \text{१८ नवम्बर}\end{array}\right}$ विनायक शास्त्री ।