मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७६ मुद्राराक्षस—
औध्र, चोल, अवगाण, सित, हूण, चीन इन देशों के राजाओं का नाश हो ।
केतु को यूरप के लोग भी कुछ विशिष्ट फलकारक मानते है, परन्तु कुछ इसका पक्का विश्वास नही करते । यह एक प्रकार का तारा है, जिस की गति का यथार्थ निर्णय नही होता और इस की बहुत जाति है, कितने एक बार देख पड़ते फिर लौट कर नही आते । इस से यह जान पड़ता है कि इनकी कक्षा को यूरप के लोग (Parabola) कहते हैं और हम ने इस का नाम परवलय रक्खा है । बहुत से केतु फिर लौट कर आते है, इसलिए उन की कक्षा सामित है अर्थात बन्धी है, इस कक्षा १० को दीर्घवृत्त कहते है जिस की नाभि और केन्द्र में बहुत अन्तर होता है ।
कितने केतु दो चार बार तो नियत काल पर लौट कर आते हैं फिर नही आते । इस से यह अनुमान होता है कि या तो वे केतु नष्ट हो गये अथवा उन की कक्षा बदल गयी । इन १५ बातों से यही सिद्ध होता है कि इन के कक्षादिकों का प्रमाण यथार्थ अभी तक किसी के ध्यान मे नही आया । इसी लिये वराहमिहिर ने लिखा है कि 'दर्शनमस्तो वा गणितविधिनाऽस्य शक्यते नैव ज्ञातुम्” अर्थात् केतुओ के उदय और अस्त गणित से नही जाने जाते ।
२० इस केतु को कई एक विद्वानों ने हिन्दी मे 'पुच्छलतारा' वा दुमदार सितारा कहा हे, परन्तु प्राचीन लोगो के मत से वह केतु की शिखा अर्थात् चोटी है, जिसे नये लोग पुच्छ कहते हैं, इस लिये हमारी समझ मे तारा पद के विशेषण म पुच्छ के बदले शिखा अर्थात् चोटी का विशेषण देना चाहिये । २५
बांकीपुर— 'खड्गविलास' प्रेस में बा० रामप्रसाद सिंह द्वारा मुद्रित ।