मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अङ्क । ४६
चाणक्य ।—शारङ्गरव ! शिष्य ।—( आकर ) आज्ञा गुरु जी ! चाणक्य ।—देख तो यह कैसी भीड़ है । शिष्य ।—( बाहर जाकर फिर आश्चर्य से आकर ) महाराज ! शकटदास को सूली पर से उतार कर सिद्धार्थक लेकर भाग गया । ५ चाणक्य ।— ( आप ही आप ) वाह सिद्धार्थक ! काम का आरम्भ तो किया ( प्रकाश ) हैं क्या ले गया ? ( क्रोध से ) बेटा ! दौड़ कर भागुरायण से कहो कि उस को पकड़े । १० शिष्य ।—( बाहर जाकर आता है ) ( विषाद से ) गुरुजी ! भागुरायण तो पहिले ही से कही भाग गया है । चाणक्य ।—( आप ही आप ) निज काज साधने के लिये जाय ( क्रोध से प्रकाश ) भद्रभट, पुरुषदत्त, हिगुराज, बलगुप्त राजसेन, रोहिताक्ष और विजयवर्म्मा से कहो कि दुष्ट १५ भागुरायण को पकड़े । शिष्य ।—जो आज्ञा ( बाहर जाकर फिर आकर विषाद से ) महाराज ! बड़े दुःख की बात है कि सब बेड़े का बेड़ा हलचल हो रहा है । भद्रभट इत्यादि तो सब पिछली ही रात भाग गये । २० चाणक्य ।—( आप ही आप ) सब काम सिद्ध करै ( प्रकाश ) बेटा, सोच मत करो । जे बात कछु जिय धारि भागे भले सुख सों भागहीं । जे रहे तेह जाहि तिन को, सोच मोहि जिय कछु नही ॥ सत सैन हूं सो अधिक साधिनि, काज की जेहि जग कहै । २५ सो नन्दकुल की खननहारी, बुद्धि नित मो मै रहै ॥