भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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तृतीय अङ्क । ७३

तासों सदा गुरु वाक्य बस हम नित्य पर आधीन हैं ।
निर्लोभ गुरु से सन्त जनही जगत मे स्वाधीन हैं ॥
(प्रकाश) अजी बैहीनार ! " सुगांगप्रसाद " का मार्ग दिखाओ ।

कंचुकी ।—इधर आइये महाराज उधर । ५
राजा ।—( आगे बढ़ता है ) ।

कंचुकी ।—महाराज ! सुगांगप्रसाद की यहीं सीढ़ी है ।
राजा ।—( ऊपर चढ़ कर ) अहा ! शरद् ऋतु की शोभा से सब दिशाए कैसी सुन्दर हो रही हैं !

सरद विमल ऋतु सोहई, निरमल नील अकास । १०
निसानाथ पूरन उदित, सोलह कला प्रकास ॥
चारु चमेली बन रही, महमह महँकि सुबास ।
नदी तीर फूले लखौ, सेत सेत बहु कास ॥
कमल कुमोदिनि सरन मे, फूले सोभा देत ।
भौँर वृन्द जापै लखौ, गूंजि गूंजि रस लेत ॥ १५
बसन चांदनी चन्द्रमुख, उडुगन मोती माल ।
कास फूल मधु हास यह, सरद् किधौं नव बाल ॥

( चारो ओर देख कर ) कंचुकी ! यह क्या ? नगर मे "चन्द्रिकोत्सव" कही नही मालूम पड़ता; क्या तू ने सब लोगों से ताकीद कर के नही कहा था कि उत्सव होय ? २०

कंचुकी ।—महाराज ! सब से ताकीद कर दी थी ।
राजा ।—तो फिर क्यों नही हुआ ? क्या लोगों ने हमारी आज्ञा नही मानी ?

कंचुकी ।—( कान पर हाथ रख कर ) राम राम ! भला नगर क्या, इस पृथ्वी में ऐसा कौन है जो आप की आज्ञा न मानै ? २५