भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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८६ मुद्राराक्षस-

तासों कल बल करि बहुत अपने बस करि वाहि ।
जिमि गज पकरैं सुघर तिमि बाघेंगे हम ताहि ॥

चन्द्रगुप्त ।—मै आप की बात तो नही काट सकता, पर इस से तो मन्त्री राक्षस ही बढ चढ के जान पडता है ।

चाणक्य ।—( क्रोध से ) 'आप नहीं' इतना क्यों छोड दिया ? ऐसा कभी नही है उसने क्या किया है कहो तो ?

चन्द्रगुप्त ।—जो आप न जानते हों तो सुनिये कि वह महात्मा
जदपि आपु जीती पुरी तदपि धारि कुशलात ।
जब लो जित चाहौ रहौ धारि सीस पै लात ॥
१० डोडी फेरन के समय निज बल जय प्रगटाय ।
मेरे बल के लोग कौ दीनों तुरत हराय ॥
मोहि परिजन रीति सों जाके सब बिनु त्रास ।
जौ मोपै निज लोकहू आनहि नहि विश्वास ॥

चाणक्य ।—( हस कर ) वृषल ! राक्षस ने यह सब किया ?
१५ चन्द्रगुप्त ।—हा ! हा ! अमात्य राक्षस ने यह सब किया ।

चाणक्य । - तो हमने जाना, जिस तरह नन्द का नाश करके तुम राजा हुए वैसे ही अब मलयकेतु राजा होगा ।

चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य ! यह उपालम्भ आप को नही शोभा देता, करने वाला सब दैव है ।

२० चाणक्य ।—रे कृतघ्न !
अतिहि क्रोध करि खोलि कै, सिखा प्रतिज्ञा कीन ।
सो सब देखत भुब करो, नव नृप नन्द विहीन ॥
घिरी स्वान अरु गीध सों, भय उपजावनिहारि ।
जारि नन्दहू नहि भई, सान्त मसान दवारि ॥

२५ चन्द्रगुप्त ।—यह सब किसी दूसरे ने किया ।

चाणक्य ।—किस ने ?

चन्द्रगुप्त ।—नन्दकुल के द्वेषी दैव ने ।