भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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६६ मुद्राराक्षस-

राक्षस ।-अजी, अब अधिकार छिन जाने पर वह ब्राह्मण कहां है ? करभक ।-अभी तो पटने ही में है । राक्षस ।-( घबडा कर ) हैं ! अभी वहीं है ? तपोबन नहीं चला गया ? या फिर कोई प्रतिज्ञा नहीं की ? करभक । - अब तपोबन जायगा -ऐसा सुनते हैं । राक्षस । -(घबडा कर ) शकटदास, यह बात तो काम की नहीं, देव नन्द को नहि गन्यो जिन भीतर अपमान । सो निज कृत नृप चन्द की बात न सहिहै जान ॥ १० मलयकेतु । मित्र भागुरायण ! चाणक्य के तपोबन जाने वा फिर प्रतिज्ञा करने से कौन कार्यसिद्धि निकाली है ? भागुरायण ।-कुमार ! यह तो कोई कठिन बात नहीं है, इस का आशय तो स्पष्ट ही है कि चन्द्रगुप्त से जितनी दूर चाणक्य रहेगा उतनी ही कार्यसिद्धि होगी । १५ शकटदास । अमात्य ! आप व्यर्थ सोच न करें, क्योंकि देखें सबहि भाँति अधिकार लहि, अभिमानी नृप चन्द । नहि सहिहै अपमान अब, राजा होइ स्वच्छन्द ॥ तिमि चाणक्यहु पाइ दुख एक प्रतिज्ञा पारि । अब दूजो करिहै न कछु उद्यम निज मद चूरि ॥ २० राक्षस । - ऐसाही होगा । मित्र शकटदास ! जाकर करभक को डेरा इत्यादि दो । शकटदास ।-जो आज्ञा । ( करभक को लेकर जाता है ) राक्षस ।-इस समय कुमार से मिलने की इच्छा है । २५ मलयकेतु ।-(आगे बढ कर ) मै आप ही आप से मिलने को आया हूँ ।