भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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संस्कारप्रकरण ९१ मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, अश्विनी, मूल, तीनों पूर्वा, पुष्य वा आश्लेषा नक्षत्र में; रविवार, बृहस्पति वा शुक्रवार में; छठि, पञ्चमी तीज, एकादशी, द्वादशी, दशमी वा दुइज तिथि में; लग्न से नवें, पाँचवें, पहिले, चौथे, सातवें और दशवें शुभ ग्रहों के रहते विद्यारम्भ शुभ होता है। कोई आचार्य तीनों उत्तरा, रेवती और अनुराधा में भी विद्यारम्भ शुभ कहते हैं ॥ ३८ ॥ वर्णक्रम से यज्ञोपवीत का समय विप्राणां व्रतबन्धनं निगदितं गर्भाज्जनेर्वाऽष्टमे वर्षे वाप्यथ पञ्चमे क्षितिभुजां षष्ठे तथैकादशे । वैश्यानां पुनरष्टमेऽप्यथ पुनः स्याद्द्वादशे वत्सरे कालेऽथ द्विगुणे गते निगदितं गौणं तदाहुर्बुधाः ॥ ३९ ॥ अन्वयः—गर्भात् वा जनेः [जन्मसमयात्] अष्टमे, अपि वा पञ्चमे वर्षे विप्राणां, (एवं) षष्ठे तथा एकादशे वर्षे क्षितिभुजाम्, पुनः अष्टमे वा द्वादशे वत्सरे वैश्यानाम् व्रतबन्धनं (शुभ) निगदितम् । अथ निगदिते काले द्विगुणे गते सति तत् व्रतम् बुधाः गौणं आहुः ॥ ३९ ॥ गर्भाधान से अथवा जन्मकाल से आठवें वा पाँचवें वर्ष में ब्राह्मणों का, छठे अथवा गेरहवें वर्ष में क्षत्रियों का, आठवें अथवा बारहवें वर्ष में वैश्यों का यज्ञोपवीत श्रेष्ठ कहा गया है। उक्तकाल के द्विगुणकाल में अर्थात् सोलहवें वर्ष ब्राह्मण का, बाइसवें वर्ष क्षत्रिय का और चौबीसवें वर्ष वैश्य का यज्ञोपवीत मध्यम कहा गया है ॥ ३९ ॥ यज्ञोपवीत के नक्षत्रादि क्षिप्रध्रुवाह्विचरमूलमृदुत्रिपूर्वा- रौद्रेऽर्कविद्गुरुसितेन्दुदिने व्रतं सत् । द्वित्रीषुरुद्ररविदिक्प्रमिते तिथौ च कृष्णादिमत्रिलवकेऽपि न चापराह्ले ॥ ४० ॥ अन्वयः—क्षिप्रध्रुवाह्विचरमूलमृदुत्रिपूर्वारौद्रे, अर्कविद्गुरुसितेन्दुदिने, द्वित्रीषुरुद्रर- विदिक्प्रमिते तिथौ, व्रतं सत् स्यात्, च (पुनः) कृष्णादिमत्रिलवके अपि सत्, च (तथा) अपराह्णे व्रतं न सत् ॥ ४० ॥ हस्त, अश्विनी, पुष्य, तीनों उत्तरा, रोहिणी, आश्लेषा, स्वाती, पुनर्वसु,