मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ मुहूर्तचिन्तामणि ब्रह्मोदन कर्म के पूर्व यदि अकस्मात् कोई उत्पातविशेष या अनध्याय हो तो वह उस लड़के के पढ़ने में विघ्नकारक होता है । इसलिए पहिले उसकी शान्ति करके तब ब्रह्मोदन कर्म करे और यदि यज्ञोपवीत के पहिले अकस्मात् कोई उत्पात हो तो यज्ञोपवीत ही न करे । ब्रह्मोदन कर्म बह्वृचों के यहाँ होता है ॥ ५६ ॥ वेदों के भेद से यज्ञोपवीत के नक्षत्र वेदक्रमाच्छशिशिवाहिकरत्रिमूलपूर्वासु पौष्णकरमैत्रमृगादितीज्ये । ध्रौवेषु चाश्विवसुपुष्यकरोत्तरेशकर्णे मृगान्त्यलघुमैत्रधनादितौ सत् ॥ ५७ ॥ अन्वयः—शशिशिवाहिकरत्रिमूलपूर्वासु, पौष्णकरमैत्रमृगादितीज्ये च ध्रौवेषु, अश्वि- वसुपुष्यकरोत्तरेशकर्णे, मृगान्त्यलघुमैत्रधनादितौ, वेदक्रमात् व्रतं सत् स्यात् ॥ ५७ ॥ मृगशिरा, आर्द्रा, आश्लेषा, हस्त, चित्रा, स्वाती, मूल और तीनों पूर्वा में ऋग्वेदाध्यायियों का; रेवती, हस्त, अनुराधा, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, रोहिणी और तीनों उत्तरा में यजुर्वेदाध्यायियों का; अश्विनी, धनिष्ठा, पुष्य, हस्त, तीनों उत्तरा, आर्द्रा और श्रवण नक्षत्र में सामवेदाध्यायियों का तथा मृगशिरा, रेवती, पुष्य, अश्विनी, हस्त, अनुराधा, धनिष्ठा और पुनर्वसु नक्षत्र में अथर्वणवेदाध्यायियों का यज्ञोपवीत शुभ होता है ॥ ५७ ॥ | मृ० | आ० | श्ले० | ह० | चित्रा | स्वाती | मू० | पू० फा० | पू० षा० | पू० भा० | ऋग्वेद | | रे० | ह० | अनु० | मृ० | पुन० | पु० | रो० | उ० फा० | उ० षा० | उ० भा० | यजुर्वेद | | अ० | ध० | पु० | ह० | उ.फा. | उ० षा० | उ० भा० | आ० | श्र० | | सामवेद | | मृ० | रेवती | पु० | अ० | ह० | अनु० | ध० | पु० | | | अ० वेद | यज्ञोपवीतादि में धर्मशास्त्र का विचार नान्दीश्राद्धोत्तरं मातुः पुष्पे लग्नान्तरे न हि । शान्त्या चौलं व्रतं पाणिग्रहः कार्योऽन्यथा न सत् ॥ ५८ ॥ अन्वयः—नान्दीश्राद्धोत्तरं मातुः पुष्पे सति, (अग्रे) लग्नान्तरे नहि (प्राप्तेसति) शान्त्वा चौलं व्रतं (कार्यम्) विवाहः (कार्यः) अन्यथा न सत् ॥ ५८ ॥ नान्दीश्राद्ध होने के पश्चात् जिसकी माता रजस्वला हो उस लड़के का मुण्डन, यज्ञोपवीत वा विवाह पूर्व विचारे हुए मुहूर्त्त को छोड़ उसी के समीप दूसरे मुहूर्त्त में करना चाहिए । यदि दैवयोग से पूर्व विचारे हुए मुहूर्त्त के समीप दूसरा शुभ मुहूर्त्त न मिले तो धर्मशास्त्र में कही हुई शान्ति* करके
- वाक्यसार में कही हुई विधि से लक्ष्मी की पूजा ।