मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—मीनोक्षकर्कलिमृगस्त्रियः यदा अष्टमं लग्नं (भवेत्) तदा अष्टम- गेहदोषकृत् न (स्यात्) अन्योन्यमित्रत्ववशेन सा वधूः सुतायुर्गृहसौख्यभागिनी- भवेत् ॥ ४७ ॥ यदि स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न मीन, वृष, कर्क, वृश्चिक, मकर और कन्या में से कोई हो तो आठवीं लग्न का दोष नहीं होता; क्योंकि ये दोनों परस्पर मित्र अथवा एक ही हैं। उदा- हरण—यथा स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न या जन्मराशि सिंह हो तो उससे आठवीं मीन हुई। सिंह के स्वामी सूर्य और मीन के स्वामी बृहस्पति की परस्पर मित्रता होने के कारण विवाह में दोष नहीं हो सकता। ऐसे ही तुला से आठवीं वृष होती है। तुला और वृष दोनों का स्वामी शुक्र है, इसलिये विवाह में कोई दोष नहीं हो सकता, ऐसे ही कर्कादि को भी जानना चाहिए। यदि ऐसे योग में विवाह हो तो वह स्त्री उत्तम पुत्र, आयु, उत्तम घर और सुख पाती है ॥ ४७ ॥ आठवीं राशि के नवांश और बारहवीं राशि का दोष मृतिभवनांशो यदि च विलग्ने तदधिपतिर्वा न शुभकरः स्यात् । व्ययभवनं वा भवति तदंशस्तदधिपतिर्वा कलहकरः स्यात् ॥ ४८ ॥ अन्वयः—मृतिभवनांशः वा तदधिपतिः यदि विलग्ने (भवेत्) तदा शुभकरः न स्यात् । यदि व्ययभवनं वा तदंशः वा तदधिपतिः यदि (विलग्ने) भवति तदा कलहकरः स्यात् ॥ ४८ ॥ स्त्री वा पुरुष की जन्मराशि से वा जन्मलग्न से आठवीं राशि का नवांश वा आठवीं राशि का स्वामी लग्न में स्थित हो तो विवाह शुभकारक नहीं होता। ऐसे ही बारहवीं राशि, बारहवीं राशि का नवांश वा बारहवीं राशि का स्वामी यदि लग्न में हो तो स्त्री-पुरुष में परस्पर झगड़ा होता है ॥ ४८ ॥ विषघटी-दोष खरामतो ३० न्यादितिवह्निपित्र्यभे खवेदतः ४० के रदत ३२ श्च सार्पभे । खबाणतो ५० श्वे धृतितो १८ र्यमाम्बुपे कृते २० र्भगत्वाष्ट्रभविश्वजीवभे ॥ ४९ ॥