भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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अन्वयः —तथा शुभे (शुभकार्ये) द्वादश्यां सार्पं निन्द्यं, आदिमे वैश्वम् निन्द्यम्, द्वितीयायां अनुराधा (निन्द्या), पञ्चम्यां पित्र्यभम् निन्द्यम् तथा तृतीयायां व्युत्तराः (निन्द्याः), एकादश्यां रोहिणी (निन्द्या), त्रयोदश्यां स्वातीचित्रे (निन्द्ये), सप्तम्यां हस्त- राक्षसे (निन्द्ये), नवम्यां कृत्तिका (निन्द्या), अष्टम्यां पूभा (निन्द्या), षष्ठयां रोहिणी (निन्द्या) ॥ ११-१३ ॥ द्वादशी तिथि में आश्लेषा, प्रतिपदा में उत्तराषाढ़, द्वितीया में अनुराधा, पञ्चमी में मघा, तृतीया में तीनों उत्तरा अर्थात् उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, एकादशी में रोहिणी, त्रयोदशी में स्वाती और चित्रा, सप्तमी में हस्त और मूल, नवमी में कृत्तिका, अष्टमी में पूर्वभाद्रपद और षष्ठि में रोहिणी निंद्य हैं। इन तिथियों में ये नक्षत्र हों तो शुभ कार्य न करे ॥ ११-१३ ॥ चैत्रादि मासों में शून्य नक्षत्र कदास्त्रभे त्वाष्ट्रवायू विश्वेज्यौ भगवासवौ । वैश्वश्रुती पाशिपौष्णे अजपादग्निपितृभे ॥ १४ ॥ चित्राद्रीशौ शिवाश्व्यर्काः श्रुतिमूले यमेन्द्रभे । चैत्रादिमासे शून्याख्यास्तारा वित्तविनाशकाः ॥ १५ ॥ अन्वयः—चैत्रादिमासे (क्रमेण) कदास्रभे, त्वाष्ट्रवायू, विश्वेज्यौ, भगवासवौ, वैश्वश्रुती, पाशिपौष्णे, अजपात्, अग्निपितृभे, चित्राद्रीशौ, शिवाश्व्यर्काः, श्रुतिमूले, यमेन्द्रभे (एताः) वित्तविनाशकाः शून्याख्याः ताराः (ज्ञेयाः) ॥ १४-१५ ॥ चैत्र में रोहिणी और अश्विनी, वैशाख में चित्रा और स्वाती, ज्येष्ठ में उत्तराषाढ़ और पुष्य, आषाढ़ में पूर्वाफाल्गुनी और धनिष्ठा, श्रावण में उत्तराषाढ़ और श्रवण, भादौं में शतभिष और रेवती, कुआर में पूर्वभाद्रपद, कार्त्तिक में कृत्तिका और मघा, अगहन में चित्रा और विशाखा, पौष में आर्द्रा, अश्विनी और हस्त, माघ में श्रवण और मूल, फाल्गुन में भरणी और ज्येष्ठा नक्षत्र शून्य हैं। इनमें शुभ कार्य करने से धन का नाश होता है ॥ १४-१५ ॥ चैत्रादि मासों में शून्य राशियाँ घटो झषो गौर्मिथुनं मेषकन्याऽलितौलिनः । धनुः कर्को मृगः सिंहश्चैत्रादौ शून्यराशय ॥ १६ ॥