मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ मुहूर्तचिन्तामणि अन्य अनिष्ट लग्न जन्मराशितनुतोऽष्टमेऽथवा स्वारिभाच्च रिपुभे तनुस्थिते । लग्नगास्तदधिपा यदाथवा स्युर्गतं हि नृपतेर्मृतिप्रदम् ॥ ४५ ॥ अन्वयः—जन्मराशितनुतः अष्टमे अथवा स्वारिभात् रिपुभे तनुस्थिते, अथवा तदधिपाः यदा लग्नगाः स्युः (तदा) नृपतेः गतं [गमनं ] हि मृतिप्रदं स्यात् ॥ ४५ ॥ जन्मराशि से या जन्मलग्न से आठवीं लग्न में अथवा शत्रु की जन्मराशि या जन्मलग्न से छठी लग्न में अथवा इन राशियों के स्वामी यदि लग्न में हों तो यात्रा करनेवाले राजा की यात्रा मृत्यु देनेवाली होती है ॥ ४५ ॥ अन्य शुभलग्न लग्ने चन्द्रे वापि वर्गोत्तमस्थे यात्रा प्रोक्ता वाञ्छितार्थैकदात्री । अम्भोराशौ वा तदंशे प्रशस्तं नौकायानं सर्वसिद्धिप्रदापि ॥ ४६ ॥ अन्वयः— लग्ने अपि वा चन्द्रे, वर्गोत्तमस्थे वाञ्छितार्थैकदात्री यात्रा प्रोक्ता । अम्भोराशौ वा तदंशे नौकायानं प्रशस्तं सर्वसिद्धिप्रदायि स्यात् ॥ ४६ ॥ मीन और कुम्भ को छोड़ अन्य लग्न, अथवा चन्द्रमा वर्गोत्तम नवांश में हो तो यात्रा वाञ्छित वस्तु देनेवाली होती है। यदि नाव में यात्रा करना हो तो जलचर लग्न में या जलचर राशि के नवांश में यात्रा करे। सब काम सिद्ध होते हैं ॥ ४६ ॥ सम्मुख तथा पृष्ठ गत लग्न दिग्द्वारभे लग्नगते प्रशस्ता यात्रार्थदात्री जयकारिणी च । हानिं विनाशं रिपुतो भयं च कुर्यात्तथा दिक्प्रतिलोमलग्ने ॥ ४७ ॥ अन्वयः—दिग्द्वारभे लग्नगते सति यात्रा प्रशस्ता अर्थदात्री च पुनः जयकारिणी (स्यात्) तथा दिक्प्रतिलोमलग्ने यात्रा हानिं, विनाशं, च रिपुतः भयं कुर्यात् ॥ ४७ ॥ यात्राकाल में दिग्द्वार राशि लग्न में हो, अर्थात् सम्मुख या दाहिने हो तो यात्रा शुभ, धनादि की देनेवाली तथा विजय करानेवाली होती है, और यदि वही दिग्द्वार राशि पीछे या बायें हो तो यात्रा हानि, विनाश और शत्रु से भय देनेवाली होती है ॥ ४७ ॥ शुभलग्न राशिः स्वजन्मसमये शुभसंयुतो यो यः स्वारिभान्निधनगोऽपि च वेशिसंज्ञः ।