भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 207 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 204

यात्राप्रकरण १९५ स्थान में चन्द्रमा, दशवें स्थान में मंगल, छठे स्थान में बुध, लग्न में बृहस्पति, चौथे स्थान में शुक्र, गेरहवें स्थान में शनैश्चर हो, ऐसे योग में भी यात्रा करनेवाले राजा की जय होती है ॥ ७४ ॥ सहजे कुजो निधनगश्च भार्गवो मदने बुधो रविररौ तनौ गुरुः । अथ चेत्स्युरिज्यसितभानवो जलत्रिगता हि सौरिरुधिरौ रिपुस्थितौ ॥ ७५ ॥ अन्वयः—कुजः सहजे, भार्गवश्च निधनगः, बुधः मदने, रविः अरौ, गुरुः तनौ । अथ चेत् इज्यसितभानवः जलत्रिगताः सौरिरुधिरौ रिपुस्थितौ (तदा) हि जयः स्यात् ॥ ७५ ॥ अथवा तीसरे स्थान में मंगल, आठवें स्थान में शुक्र, सातवें स्थान में बुध, छठे स्थान में सूर्य और लग्न में बृहस्पति हो, अथवा बृहस्पति, शुक्र, सूर्य ये ग्रह चौथे और तीसरे स्थानों में हों और शनैश्चर, मङ्गल ये दोनों छठे स्थान में हों, ऐसे योग में भी यात्रा करनेवाले राजा की जय होती है ॥ ७५ ॥ यात्राकालिक योगादि एको ज्ञेज्यसितेषु पञ्चमतपःकेन्द्रेषु योगस्तथा द्वौ चेत्तेष्वधियोग एषु सकला योगाधियोगः स्मृतः । योगे क्षेममथाधियोगगमने क्षेमं रिपूणां वधं चाथो क्षेमयशोऽवनीश्च लभते योगाधियोगे व्रजन् ॥ ७६ ॥ अन्वयः—ज्ञेज्यसितेषु एकः (यदि) पञ्चमतपःकेन्द्रेषु (स्थितः तदा) योगः (स्यात्) तथा तेषु चेत् द्वौ [स्थितौ] (तदा) अधियोगः एषु यदि सकलाः (स्थिताः तदा) योगाधियोगः स्मृतः । अथ योगे [गमने] क्षेमं, अधियोगगमने क्षेमं, रिपूणां वधं च लभते, योगाधियोगे व्रजन् क्षेमयशोऽवनीश्च लभते ॥ ७६ ॥ पाँचवें, नवें, पहिले, चौथे, सातवें, दसवें इन स्थानों में यदि बुध, बृहस्पति अथवा शुक्र इनमें से कोई एक ग्रह स्थित हो तो योग, दो ग्रह एक साथ अथवा अलग-अलग इन्हीं स्थानों में स्थित हों तो अधियोग और तीनों ग्रह साथ अथवा अलग-अलग इन्हीं स्थानों में स्थित हों तो योगाधियोग होता है। योग में यात्रा करने से क्षेम, अधियोग में यात्रा करने से क्षेम और शत्रुओं का नाश और योगाधियोग में यात्रा करने से क्षेम, यश तथा पृथ्वी का लाभ होता है ॥ ७६ ॥