मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ मुहूर्त्तचिन्तामणि भेद कहा जाता है। दो ग्रहों की किरणों का परस्पर मिलकर एक हो जाना अंशुविमर्द कहा जाता है और अंशुविमर्द नामक युद्ध में एक ग्रह के हीन होने पर अपसव्य कहा जाता है। ऐसा वराहमिहिराचार्य ने कहा है ॥ ३२ ॥ सूर्य और चन्द्रग्रहण के त्याज्य नक्षत्र और दिन नेष्टं ग्रहक्षं सकलार्द्धपादग्रासे क्रमात्तर्कगुणेन्दुमासान् । पूर्वं परस्तादुभयोस्त्रिघस्रा ग्रस्तेऽस्तगे वाप्युदितेऽर्द्धखण्डे ॥ ३३ ॥ अन्वयः—सकलार्धपादग्रासे क्रमात् तर्कगुणेन्दुमासान् ग्रहक्षं नेष्टम्। ग्रस्तेऽस्तगे पूर्वं त्रिघस्रा नेष्टाः। ग्रस्तेऽभ्युदिते परस्तात् (त्रिघस्रा नेष्टाः)। अर्धखण्डे (ग्रासे) उभयोः (पूर्वापरयोः) त्रिघस्राः (तित्रिघस्राः) नेष्टाः ॥ ३३ ॥ चन्द्रमा वा सूर्य के बिम्ब का सर्वग्रास हो तो छः महीने तक, अर्द्धग्रास हो तो तीन महीने तक, चतुर्थांश का ग्रास हो तो एक ही महीने वह नक्षत्र त्याज्य होता है जिस नक्षत्र में ग्रहण हुआ हो। अर्थात् उक्त दिनों तक उस नक्षत्र में कोई शुभ कार्य न करे। यदि ग्रहण लगते ही सूर्य या चन्द्र अस्त हो जाय तो पहले तीन दिन में और यदि ग्रसित सूर्य या चन्द्रमा उदय हो तो ग्रहण होने के अनन्तर तीन दिन में कोई शुभ कार्य न करना चाहिए। यदि अर्द्धग्रास हो तो तीन दिन पहले और तीन दिन पश्चात् और ग्रहण का दिन भी शुभ कर्मों में त्यागना चाहिए ॥ ३३ ॥ त्याज्य नक्षत्र और योग आदि जन्मर्क्षमासतिथयो व्यतिपातभद्रा- वैधृत्यमापितृदिनानि तिथिक्षयर्द्धी । न्यूनाधिमासकुलिकप्रहरार्धपाता विष्कम्भवज्रघटिकात्रयमेव वर्ज्यम् ॥ ३४ ॥ परिघार्धं पञ्च शूले षट् च गण्डातिगण्डयोः । व्याघाते नवनाड्यश्च वर्ज्याः सर्वेषु कर्मसु ॥ ३५ ॥ अन्वयः—जन्मर्क्षमासतिथयः (वर्ज्याः), व्यतिपातभद्रावैधृत्यमापितृदिनानि (वर्ज्यानि), तिथिक्षयर्द्धी (वर्ज्ये), न्यूनाधिमासकुलिकप्रहरार्धपाताः (वर्ज्याः), विष्कम्भवज्रघटिकात्रयं एव वर्ज्यम्। सर्वेषु कर्मसु परिघार्धं (वर्ज्यम्), शूले पञ्च, गण्डातिगण्डयोः षट्, व्याघाते नव नाड्यः वर्ज्याः ॥ ३४-३५ ॥