मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनक्षत्रप्रकरण ३३ है । परन्तु जन्मनक्षत्र न हो । पुनर्वसु, धनिष्ठा, चित्रा, अनुराधा, अश्विनी इन नक्षत्रों में सिलाई के काम शुभ हैं ॥ १५ ॥ क्रय-विक्रय मुहूर्तों का परस्पर निषेध और क्रयमुहूर्त्त क्रयर्क्षे विक्रयो नेष्टो विक्रयर्क्षे क्रयोऽपि न । पौष्णाम्बुपाश्विनीवातश्रवश्चित्राः क्रये शुभाः ॥ १६ ॥ अन्वयः—क्रयर्क्षे विक्रयो नेष्टः, विक्रयर्क्षे क्रयः अपि न, पौष्णाम्बुपाश्विनीजात- श्रवश्चित्राः क्रये शुभाः ॥ १६ ॥ मोल लेने के मुहूर्त्त में बेचना शुभ नहीं है और बेचने के मुहूर्त्त में मोल लेना शुभ नहीं है । यद्यपि मोल लेनेवाला बेचनेवाले के मुहूर्त्त में मोल नहीं लेगा तो बेचनेवाला किस के हाथ बेचेगा, और बेचनेवाला मोल लेनेवाले के मुहूर्त्त में बेचेगा नहीं तो मोल लेनेवाला क्या मोल लेगा । इस रीति से दोनों कार्य नहीं हो सकते तथापि आवश्यकता के कारण किसी एक के मुहूर्त्त का विचार न करने से दूसरे का कार्य हो सकता है, यही इसका तात्पर्य है । रेवती, शतभिष, अश्विनी, स्वाती, श्रवण, चित्रा ये नक्षत्र मोल लेने में शुभ होते हैं ॥ १६ ॥ विक्रय और विपणि का मुहूर्त्त पूर्वाद्वीशकृशानुसार्पयमभे केन्द्रद्विकोणे शुभैः षट्त्र्यायेष्वशुभैर्विना घटतनुं सन्विक्रयः सत्तिथौ । रिक्ताभौमघटान्विना च विपणिर्मित्रध्रुवक्षिप्रभै- र्लग्ने चन्द्रसिते व्ययाष्टरहितैः पापैः शुभैर्द्वचायखे ॥ १७ ॥ अन्वयः—पूर्वाद्वीशकृशानुसार्पयमभे शुभैः केन्द्रत्रिकोणे, अशुभैः षट्त्र्यायेषु (स्थितैः) घटतनुं विना, सत्त्थिौ विक्रयः सत्, रिक्ताभौमघटान् विना, च मित्रध्रुव- क्षिप्रभैः चन्द्रसिते लग्ने, पापैः व्ययाष्टरहितैः, शुभैः द्वचायखे, विपणिः सत् ॥ १७ ॥ तीनों पूर्वा, विशाखा, कृत्तिका, आश्लेषा और भरणी नक्षत्र में लग्न से पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, दूसरे, पाँचवें और नवें स्थान में शुभग्रह हों, छठें, तीसरे, गेरहवें स्थान में अशुभ ग्रह हों ऐसे लग्न में, कुंभ को छोड़ अन्य लग्नों में और शुभ तिथियों में किसी वस्तु का बेचना शुभ होता है । चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, रोहिणी, तीनों उत्तरा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, इन नक्षत्रों में, चौथि, नवमी, चतुर्दशी, मङ्गल दिन, कुम्भ लग्न को छोड़ अन्य