मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ मुहूर्त्तचिन्तामणि ही होता है, अन्य देशों में नहीं, ऐसा कश्यपजी का वचन है। परन्तु बृहस्पतिजी ने क्रमवेध जन्मराशि से और विपरीतवेध ग्रह-स्थान से कहा है। हमारी समझ में भी यही माननीय है ॥ ५ ॥ ग्रहण-नक्षत्र का फल जन्मर्क्षे निधनं ग्रहे जनिभतो घातः क्षतिः श्रीर्व्यथा चिन्तासौख्यकलत्रदौस्थ्यमृत्यवः स्युर्माननाशः सुखम् । लाभोऽपाय इति क्रमात्तदशुभध्वस्त्यै जपः स्वर्णगो- दानं शान्तिरथो ग्रहं त्वशुभदं नो वीक्ष्यमाहुः परे ॥ ६ ॥ अन्वयः—जन्मर्क्षे ग्रहे निधनं, जनिभतः ग्रहणे घातः, क्षतिः, श्रीः, व्यथा, चिन्ता, सौख्य-कलत्रदौस्थ्यमृत्यवः, माननाशः, सुखं, लाभः, अपाय इति क्रमात् स्युः। तदशुभ- ध्वस्त्यै जपः, स्वर्णगोदानं, शान्तिः, अथो परे [आचार्याः] अशुभदं ग्रहं नो वीक्ष्यं आहुः ॥ ६ ॥ जिसके जन्मनक्षत्र में सूर्य या चन्द्रमा का ग्रहण हो उसका मरण होता है। जन्मराशि से लेकर बारह राशियों में ग्रहण हो तो इस क्रम से घातादि फल होता है, अर्थात् जन्मराशि में चन्द्रमा वा सूर्य का ग्रहण हो तो शरीर- पीड़ा, जन्मराशि से दूसरी राशि में हो तो हानि, तीसरी में लक्ष्मी, चौथी में व्यथा, पाँचवीं में पुत्रादि की चिंता, छठी में सौख्य, सातवीं में स्त्रीमरण, आठवीं राशि में अपना मरण, नवीं राशि में माननाश, दसवीं राशि में सुख, गेरहवीं राशि में लाभ और बारहवीं राशि में मरण होता है। चन्द्र-सूर्य-ग्रहण दोष के नाश के लिए त्र्यम्बकादि मन्त्रों का जप, सोने वा गौ का दान यही शान्ति है। अशुभ फल देनेवाले ग्रहण को नहीं देखना चाहिए, ऐसा कोई आचार्य कहते हैं ॥ ६ ॥ चन्द्रमा का विशेष शुभाशुभत्व पापान्तः पापयुग्द्यूने पापाच्चन्द्रः शुभोऽप्यसन् । शुभांशे चाधिमित्रांशे गुरुदृष्टोऽशुभोऽपि सत् ॥ ७ ॥ अन्वयः—चन्द्रः पापान्तः पापयुक्, पापात् द्यूने, शुभोऽपि असत् [अशुभः], वा शुभांशे, अधिमित्रांशे, वा गुरुदृष्टः, अशुभोऽपि सत् [शुभः] (स्यात्) ॥ ७ ॥ दो पापग्रहों के मध्य में स्थित, अथवा पापग्रहसंयुक्त, अथवा पापग्रह के स्थान से सातवें स्थान में स्थित शुभ भी चन्द्रमा अशुभ फल देता है।