भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

७० मुहूर्तचिन्तामणि प्रत्येक ग्रह की प्रसन्नता के लिए माणिक्यादि का धारण माणिक्यमुक्ताफलविद्रुमणि गारुत्मकं पुष्पकवज्रनीलम् । गोमेदवैदूर्यकमर्कतः स्यूरतनान्यथो ज्ञस्य मुदे सुवर्णम् ॥ १० ॥ धार्यं लाजावर्त्तकं राहुकेत्वो रौप्यं शुक्रेन्द्रोश्च मुक्ता गुरोस्तु । लोहं मन्दस्यारभान्वोः प्रवालं तारा जन्मर्क्षात्त्रिरावृत्तितःस्यात् ॥ ११ ॥ अन्वयः—माणिक्यमुक्ताफलविद्रुमणि, गारुत्मकं, पुष्पकवज्रनीलं, गोमेदवैदूर्यकम् (क्रमण) अर्कतः सकाशात् रत्नानि (धार्याणि) अथो ज्ञस्य मुदे सुवर्णम् (धार्यम्) । राहुकेत्वोः (मुदे) लाजवर्तकं धार्यम्, शुक्रेन्द्रोः रौप्यं, गुरोश्च मुक्ता, तु (तथा) मन्दस्य लोह, आरभान्वोः प्रवालं (धार्यम्) तथा जन्मर्क्षात् त्रिरावृत्तितः तारा स्यात् ॥ १०-११ ॥ माणिक्य, मोती, मूँगा, मरकत, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद, वैडूर्य ये प्रत्येक रत्न, सूर्यादि प्रत्येक ग्रहों की प्रसन्नता के लिए धारण करना चाहिए । बहुमूल्य रत्न न मिलें तो अल्पमूल्य वस्तुएँ धारण करने को कहते हैं । बुध की प्रसन्नता के लिए सुवर्ण, राहु और केतु की प्रसन्नता के लिए लाजावर्त मणि, शुक्र और चन्द्रमा की प्रसन्नता के लिए चाँदी, बृहस्पति की प्रसन्नता के लिए मोती, शनैश्चर की प्रसन्नता के लिए लोहा, मंगल और सूर्य की प्रसन्नता के लिए मूँगा धारण करना चाहिए । अब तारा कहते हैं । जन्मनक्षत्र से दिननक्षत्र तक तीन आवृत्ति करने से तारा सिद्ध होती है, अर्थात् जिस दिन जिसकी तारा विचारना हो, उसके जन्मनक्षत्र से उस दिन के नक्षत्र तक गिने, जितनी संख्या हो उसमें नव का भाग देने पर जितने शेष रहें वही तारा होगी ॥ १०-११ ॥ ताराओं के नाम और फल जन्माख्यसंपद्विपदः क्षेमप्रत्यरिसाधकाः । वधमैत्रातिमैत्राः स्युस्तारानामसदृक्फलाः ॥ १२ ॥ अन्वयः—जन्माख्यसंपद्विपदः क्षेमप्रत्यरिसाधकाः वधमैत्रातिमैत्राः (एता) नाम- सदृक्फलाः तारा स्युः ॥ १२ ॥ एक शेष हो तो तारा का नाम जन्मर्क्ष, दो शेष हों तो संपत्, तीन शेष हों तो विपत्, चार शेष हों तो क्षेम, पाँच शेष हों तो प्रत्यरि, छः शेष हों तो साधक, सात शेष हों तो वध, आठ शेष हों तो मैत्र, नव शेष हों तो अति- मैत्र होता है । ये सब तारा नाम के समान फल देनेवाली होती हैं ॥ १२ ॥