मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ मुहूर्त्तचिन्तामणि नक्षत्र की भुक्त घटी जोड़े। फिर उसे चार से गुणा करे और पैंतालिस का भाग दे। जो लब्ध हों वे मेषादि राशियों में स्थित चन्द्रमा की भुक्त अवस्था होगी और शेष वर्त्तमान अवस्था होगी और यदि लब्ध बारह से अधिक हों तो उनमें बारह का भाग देकर जो शेष रहें वह भुक्त अवस्था होगी ॥ १४ ॥ अवस्थाओं के नाम और फल प्रवासनाशौ मरणं जयश्च हास्यारतिक्रीडितसुप्तभुक्ताः । ज्वराख्यकम्पस्थिरता अवस्था मेषात्क्रमात्नामसदृक्फलाःस्युः ॥ १५ ॥ अन्वयः—प्रवासनाशौ मरणं जयः हास्यारतिक्रीडितसुप्तभुक्ताः ज्वराख्यकम्प- स्थिरताः (एताः) मेषात् क्रमात् नामसदृक्फला अवस्थाः स्युः ॥ १५ ॥ प्रवास, नाश, मरण, जय, हास्या, रति, क्रीड़ा, सुप्त, भुक्त, ज्वर, कम्प स्थिरता ये उक्त अवस्थाओं के नाम हैं। ये मेषादि क्रम से अर्थात् चन्द्रमा मेष में हो तो प्रवासादि क्रम से, वृष में हो तो नाशादि क्रम से, मिथुन में हो तो मरणादि क्रम से, कर्क में हो तो जयादि क्रम से, सिंह में हो तो हास्यादि क्रम से, कन्या में हो तो रत्यादि क्रम से, तुला में हो तो क्रीड़ादि क्रम से, वृश्चिक में हो तो सुप्तादि क्रम से, धन में हो तो भुक्तादि क्रम से, मकर में हो तो ज्वरादि क्रम से, कुम्भ में हो तो कम्पादि क्रम से और मीन में हो तो स्थिरतादि क्रम से होती हैं। इनका फल इन्हीं नामों के समान होता है ॥ १५ ॥ ग्रह-दोष-शान्ति के लिए औषधयुक्त जल से स्नान लाजाकुष्ठबलाप्रियंगुघनसिद्धार्थैर्निशादारुभिः पुङ्खालोध्रयुतैर्जलैर्निगदितं स्नानं ग्रहोत्थघहृत् । धेनुःकम्ब्वरुणो वृषश्च कनकं पीताम्बरं घोटकः श्वेतो गौरसिता महासिरज इत्येता रवेर्दक्षिणाः ॥ १६ ॥ अन्वयः—लाजाकुष्ठबलाप्रियंगुघनसिद्धार्थैः निशादारुभिः पुङ्खालोध्रयुतैः जलैः ग्रहोत्थाघहृत् स्नानं निगदितम्, धेनुः, कम्बु, अरुणो वृषः च कनकं, पीताम्बरं, श्वेतः घोटकः, असिता गौः, महासिः, अजः इति एताः रवेः (क्रमेण) दक्षिणाः (ज्ञेयाः) ॥ १६ ॥ लज्जावती, कूट, बरियारा, काकुनि, मुस्ता, सरसो, हल्दी, देवदारु, शरपुंखा, लोध इन ओषधियों से युक्त जल से स्नान करना ग्रहों के दोष का हरण करनेवाला कहा गया है। अब सूर्यादि ग्रहों की दक्षिणा कहते हैं। सूर्य