भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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संस्कारप्रकरण ८९ साधारण क्षौरादि का मुहूर्त और निषेध दन्तक्षौरनखक्रियात्र विहिता चौलोदिते वारभे पातंग्याररवीन् विहाय नवमं घस्रं च सन्ध्यां तथा । रिक्तां पर्वनिशां निरासनरणग्रामप्रयाणोद्यतः स्नाताभ्यक्तकृताशनैर्नहि पुनः कार्या हितप्रेप्सुभिः ॥ ३४ ॥ अन्वयः-पातंग्याररवीन् विहाय च नवमं घस्रं, सन्ध्यां, रिक्तां पर्वनिशां विहाय, चौलोदिते वारभे, दन्तक्षौरनखक्रिया विहिता। अत्र निरासनरणग्रामप्रयाणोद्यतः स्नाताभ्यक्तकृताशनैः हितप्रेप्सुभिः (जनैः) दन्तक्षौरनखक्रिया नहि कार्या ॥ ३४ ॥ शनैश्चर, मंगल, रविवार, क्षौर दिन से नवें दिन, संध्याकाल, चौथि, नवमी, चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णमासी, अमावास्या, सूर्यसंक्रान्ति और रात्रि को छोड़ मुण्डन में कहे हुए तिथि, वार, नक्षत्र और लग्न में दाँतों को साफ कराना, बाल बनवाना और नख कटाना शुभ कहा है। जिनको अपने हित की इच्छा हो वे बिना आसन के, रणभूमि में, किसी अन्य गाँव में, यात्रा की तैयारी कर चुकने पर, स्नान करके, उबटन या तेल लगाकर और भोजन करके उक्त तीनों काम न करें ॥ ३४ ॥ निमित्तवश क्षौरकर्म ऋतुपाणिपीडमृतिबन्धमोक्षणे क्षुरकर्म च द्विजनृपाज्ञयाचरेत् । शववाहतीर्थगमसिन्धुमज्जनक्षुरमाचरेन्न खलु गर्भिणीपतिः ॥ ३५ ॥ अन्वयः-ऋतुपाणिपीडमृतिबन्धमोक्षणे द्विजनृपाज्ञया क्षुरकर्म आचरेत् । खलु गर्भिणीपतिः, शववाहतीर्थगमसिन्धुमज्जनक्षुरं न आचरेत् ॥ ३५ ॥ यज्ञ में, विवाह में, माता-पिता के मरण में, बन्धन से छूटने पर अथवा ब्राह्मण वा राजा की आज्ञा से सदा बाल बनवावे; चाहे निषिद्ध भी वारादि हो तो भी कुछ दोष नहीं। अब गर्भिणीपति के त्याज्य कर्म कहते हैं। शव का ले जाना, तीर्थयात्रा, समुद्र में स्नान और क्षौरकर्म जिसकी स्त्री गर्भवती हो वह पुरुष इतने कर्म न करे ॥ ३५ ॥ क्षौरकर्म में राजाओं के लिए विशेष नृपाणां हितं क्षौरभे श्मश्रुकर्म दिने पञ्चमे पञ्चमेऽस्योदये वा । षडग्निस्रिमैत्रोऽष्टकःपञ्चपित्र्योऽब्दतोऽब्ध्यर्यमा क्षौरकृन्मृत्युमेति ॥ ३६ ॥