मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
यात्राप्रकरण १९७ अकाल * में बिजली चमकने, मेघों के गर्जने, वर्षा होने और कुहरा पड़ने पर सात दिन तक यात्रा न करे ॥ ७९ ॥ यात्रा-विशेष का विचार महीपतेरेकदिने पुरात्पुरे यदा भवेतां गमनप्रवेशकौ । भवारशूलप्रतिशुक्रयोगिनीर्विचारयेन्नैवकदापि पण्डितः ॥ ८० ॥ यद्येकस्मिन्दिवसे महीपतेर्निर्गमप्रवेशौ स्तः । तर्हि विचार्यः सुधिया प्रवेशकालो न यात्रिकस्तत्र ॥ ८१ ॥ अन्वयः—यदा महीपतेः एकदिने पुरात् पुरे गमनप्रवेशकौ भवेतां (तदा) भवारशूलप्रतिशुक्रयोगिनीः पण्डितः कदापि नैव विचारयेत् । यदि महीपतेः एकस्मिन् दिवसे निर्गमप्रवेशौ स्तः तर्हि तत्र सुधिया प्रवेशकालः विचार्यः यात्रिकः न (विचार्यः) ॥ ८०-८१ ॥ जहाँ एक ही दिन में राजा का गमन और प्रवेश हो अर्थात् किसी गाँव से चलकर अन्य अभीष्ट गाँव में पहुँचना हो, तो पण्डित को चाहिए कि नक्षत्रशूल, वारशूल, सम्मुख शुक्र, योगिनी इत्यादि न विचारे, केवल पंचांगशुद्धि देखकर यात्रा करे ॥ ८० ॥ और जहाँ एक ही दिन में राजा की यात्रा और प्रवेश हो अर्थात् किसी गाँव से चलकर अन्य अभीष्ट गाँव में पहुँचना हो वहाँ पहुँचने ही का काल विचारने योग्य होता है न कि यात्रा का काल ॥ ८१ ॥ यात्रा में त्रिनवमी दोष प्रवेशान्निर्गमं तस्मात्प्रवेशं नवमे तिथौ । नक्षत्रे च तथा वारे नैव कुर्यात्कदाचन ॥ ८२ ॥ अन्वयः—प्रवेशात् निर्गमं (कृत्वा) तस्मात् (निर्गमदिनात्) नवमे तिथौ नवमे नक्षत्रे तथा च नवमे वारे प्रवेशः कदाचन नैव कुर्यात् ॥ ८२ ॥ घर में पहुँचने की तिथि नक्षत्र वार से नवम तिथि नक्षत्र वार में यात्रा, और यात्रा के तिथि नक्षत्र वार से नवम तिथि नक्षत्र वार में गृहप्रवेश कदापि न करे । प्रयाण-नवमी प्रवेश-नवमी नवमी तिथि इनमें प्रवेश के दिन से नवम दिन प्रयाण-नवमी और यात्रा के दिन से नवम दिन प्रवेश-नवमी कही जाती है । नवमी तिथि प्रसिद्ध ही है, ये तीनों यात्रा में निषिद्ध हैं ॥ ८२ ॥ *पौषादि चार महीनों में पानी बरसना अकाल-वृष्टि है ।
१९८ मुहूर्त्तचिन्तामणि यात्राकाल में कर्तव्य विधि अग्निं हुत्वा देवतां पूजयित्वा नत्वा विप्रानर्चयित्वा दिगीशम् । दत्त्वा दानं ब्राह्मणेभ्यो दिगीशं ध्यात्वा चित्ते भूमिपालोऽधिगच्छेत् ॥ ८३ ॥ अन्वयः—अग्निं हुत्वा, देवतां पूजयित्वा, विप्रान् नत्वा, दिगीशं अर्चयित्वा, ब्राह्मणेभ्यो दानं दत्त्वा, चित्ते दिगीशं ध्यात्वा भूमिपालः अधिगच्छेत् ॥ ८३ ॥ राजा को चाहिए कि अग्नि में हवन, इष्टदेवता की पूजा, ब्राह्मणों को नमस्कार, दिशा के स्वामी की पूजा करके और ब्राह्मणों को दान देकर चित्त में दिशा के स्वामी का ध्यान कर यात्रा करे ॥ ८३ ॥ नक्षत्र-दोहद कुल्माषांस्तिलतण्डुलानपि तथा माषांश्च गव्यं दधि त्वाज्यं दुग्धमथैणमांसमपरं तस्यैव रक्तं तथा । तद्वत्पायसमेव चाषपललं मार्गं च शाशं तथा षाष्टिक्यं च प्रियङ्गवपूपमथवाचित्राण्डजान्सत्फलम् ॥ ८४ ॥ कौर्मं सारिकगौधिकं च पललं शाल्यं हविष्यं हया- दृक्षे स्यात्कृसरान्नमुद्गमपि वा पिष्टं यवानां तथा । मत्स्यान्नं खलु चित्रितान्नमथवा दध्यन्नमेवं क्रमा- दृक्ष्याभक्ष्यमिदं विचार्य मतिमान्भक्षेतथाऽऽलोकयेत् ॥ ८५ ॥ अन्वयः—हयादृक्षे [अश्विन्यादिनक्षत्रे] क्रमात् कुल्माषान्, तिलतण्डुलान् तथा माषान्, गव्यं दधि, आज्यं, दुग्धं, अथ एणमांसं, तथा अपरं तस्य [मृगस्य] रक्तं, तद्वत् एव पायसम्, चाषपललम्, च मार्गम् [मृगमांसम्] शाशं [शशमांसं] तथा षाष्टिक्यं, प्रियंग्वपूपं अथवा चित्राण्डजान्, सत्फलम् कौर्मं पललं च पुनः सारिकगौधिकं पललं, शाल्यं, हविष्यं कृसरान्नमुद्गम् अपि यवानां पिष्टम्, तथा मत्स्यान्नं चित्रितान्नं अथवा दध्यन्नं (एवं कुलदेशानुसारेण) भक्ष्याभक्ष्यं इदम् विचार्य मतिमान् खलु भक्षेत् तथा आलोकयेत् ॥ ८४-८५ ॥ अश्विनी में पकाये हुए खड़े उड़द, भरणी में तिल मिले हुए चावल, कृत्तिका में उड़द, रोहिणी में गौ का दही, मृगशिरा में गौ का घी, आर्द्रा में गौ का दूध, पुनर्वसु में हरिण का मांस, पुष्य में हरिण का रक्त, आश्लेषा में खीर, मघा में चाषपक्षी का मांस, पूर्वाफाल्गुनी में मृग का मांस, उत्तराफाल्गुनी में शशा का मांस, हस्त में साँठी का भात, चित्रा में काकुनि, स्वाती में पुआ, विशाखा में अनेक प्रकार के पक्षियों का मांस,