मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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९४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३
| वक्ष्यति च—"न येषु जिह्मम- | जैसा कि आगे (प्रश्नोपनिषद्में) |
|---|---|
| नृतं न माया च" (प्र० | कहेंगे भी *'जिन पुरुषोंमें अकुटिलता, |
| उ० १।१६) इति । | अनृत और माया नहीं है' इत्यादि । |
| कोऽसावात्मा य एतैः साध- | जो आत्मा इन साधनोंसे प्राप्त |
| नैर्लभ्य इत्युच्यते । अन्तःशरीरे- | किया जाता है वह कौन है— |
| ऽन्तर्मध्ये शरीरस्य पुण्डरीकाकाशे | इसपर कहा जाता है—'अन्तः- |
| ज्योतिर्मयो हि रुक्मवर्णः शुभ्रः | शरीरे' अर्थात् शरीरके भीतर |
| शुद्धो यमात्मानं पश्यन्त्युपलभन्ते | पुण्डरीकाकाशमें जो ज्योतिर्मय |
| यतयो यतनशीलाः संन्यासिनः | सुवर्णवर्ण शुभ्र यानी शुद्ध आत्मा |
| क्षीणदोषाः क्षीणक्रोधादिचित्त- | है, जिसे कि क्षीणदोष यानी |
| मलाः । स आत्मा नित्यं सत्या- | जिनके क्रोधादि मनोमल क्षीण हो |
| दिसाधनैः संन्यासिभिर्लभ्यते । | गये हैं वे यतिजन—यत्नशील |
| न कादाचित्कैः सत्यादिभिः | संन्यासीलोग देखते अर्थात् उपलब्ध |
| लभ्यते । सत्यादिसाधनस्तु- | करते हैं । तात्पर्य यह है कि वह |
| त्यर्थोऽयमर्थवादः ॥ ५ ॥ | आत्मा सर्वदा सत्यादि साधनोंसे ही |
| संन्यासियोंद्वारा प्राप्त किया जा | |
| सकता है—कभी-कभी व्यवहार | |
| किये जानेवाले सत्यादिसे प्राप्त नहीं | |
| होता । यह अर्थवाद सत्यादि | |
| साधनोंकी स्तुतिके लिये है ॥ ५ ॥ |
सत्यकी महिमा
सत्यमेव जयति नानृतं
सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
* इस भविष्यत्कालिक उक्तिसे विदित होता है कि उपनिषद्भाष्यके विद्यार्थियोंको प्रश्नोपनिषद्के पश्चात् मुण्डकका अध्ययन करना चाहिये ।