मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९९ |
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| गृह्यते। तथा वैदिकेनाग्निहोत्रादि-कर्मणा प्रसिद्धमहत्त्वेनापि न गृह्यते । किं पुनरतस्य ग्रहणे साधनमित्याह—<br><br> ज्ञानप्रसादेन। आत्मावबोधनसमर्थमपि स्वभावेन सर्वप्राणिनां ज्ञानं बाह्यविषयरागादिदोषकलुषितमप्रसन्नमशुद्धं सन्नावबोधयति नित्यं संनिहितमप्यात्मतत्त्वं मलावनद्धमिवादर्शनम्, विल्लुलितमिव सलिलम्। तद्यदेन्द्रियविषयसंसर्गजनितरागादिमलकालुष्यापनयनादादर्शसलिलादिवत्प्रसादितं स्वच्छं शान्तमवतिष्ठते तदा ज्ञानस्य प्रसादः स्यात् ।<br><br> तेन ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वो विशुद्धान्तःकरणो योग्यो ब्रह्म द्रष्टुं यस्मात्ततस्तस्मात्तु तमात्मानं पश्यते पश्यत्युपलभते | यह तपसे भी ग्रहण नहीं किया जाता और न जिसका महत्त्व सुप्रसिद्ध है उस अग्निहोत्रादि वैदिक कर्मसे ही गृहीत होता है। तो फिर उसके ग्रहण करनेमें क्या साधन है ? इसपर कहते हैं—<br><br> ज्ञान (ज्ञानकी साधनभूता बुद्धि) के प्रसादसे [उसका ग्रहण हो सकता है]। सम्पूर्ण प्राणियोंका ज्ञान स्वभावसे आत्मबोध करानेमें समर्थ होनेपर भी, बाह्य विषयोंके रागादि दोषसे कलुषित—अप्रसन्न यानी अशुद्ध हो जानेके कारण उस आत्मतत्त्वका, सर्वदा समीपस्थ होनेपर भी, मलसे ढके हुए दर्पण तथा चञ्चल जलके समान बोध नहीं करा सकता। जिस समय इन्द्रिय और विषयोंके संसर्गसे होनेवाले रागादि दोषरूप मलके दूर हो जानेपर दर्पण या जल आदिके समान चित्त प्रसन्न—स्वच्छ अर्थात् शान्तभावसे स्थित हो जाता है उस समय ज्ञानका प्रसाद होता है।<br><br> क्योंकि उस ज्ञानप्रसादसे विशुद्धसत्त्व यानी शुद्धचित्त हुआ पुरुष ब्रह्मका साक्षात्कार करने योग्य होता है इसलिये तब वह ध्यान करके अर्थात् सत्यादि साधनसम्पन्न |