मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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द्वितीय खण्ड
आत्मवेत्ताकी पूजाका फल
| यस्मात्— | क्योंकि— |
|---|
स वेदैतत्परमं ब्रह्म धाम
यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् ।
उपासते पुरुषं ये ह्यकामा-
स्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १ ॥
वह (आत्मवेत्ता) इस परम आश्रयरूप ब्रह्मको, जिसमें यह समस्त जगत् अर्पित है और जो स्वयं शुद्धरूपसे भासमान हो रहा है, जानता है। जो निष्काम भावसे उस आत्मज्ञ पुरुषकी उपासना करते हैं वे बुद्धिमान्लोग शरीरके बीजभूत इस वीर्यका अतिक्रमण कर जाते हैं। [अर्थात् इसके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं] ॥ १ ॥
| स वेद जानातीत्येतद्यथोक्तलक्षणं ब्रह्म परममुत्कृष्टं धाम सर्वकामानामाश्रयमास्पदं यत्र यस्मिन् ब्रह्मणि धाम्नि विश्वं समस्तं जगन्निहितमर्पितं यच्च स्वेन ज्योतिषा भाति शुभ्रं शुद्धम् । तमप्येवमात्मज्ञं पुरुषं ये ह्यकामा विभूतितृष्णावर्जिता मुमुक्षवः | वह (आत्मवेत्ता) सम्पूर्ण कामनाओंके परम यानी उत्कृष्ट आश्रयभूत इस पूर्वोक्त लक्षणवाले ब्रह्मको जानता है, जिस ब्रह्मपदमें यह विश्व यानी सम्पूर्ण जगत् निहित—समर्पित है और जो कि अपने तेजसे—शुद्धरूपसे प्रकाशित हो रहा है। उस इस प्रकारके आत्मज्ञ पुरुषकी भी जो लोग निष्काम अर्थात् ऐश्वर्यकी तृष्णासे रहित होकर यानी मुमुक्षु होकर परमदेवके, |